धान की खेती का रकबा घटाने का प्रयास

06-Jul-2026 08:11 PM

नई दिल्ली। अल नीनो के प्रकोप से दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने की संभावना से इस बार देश में बारिश कम होने का अनुमान है जिससे खासकर खरीफ सीजन के सबसे प्रमुख खाद्यान्न- धान की खेती पर असर पड़ सकता है। धान ऐसी फसल है जिसे रोपाई से लेकर परिपक्व होने तक पानी की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है। ध्यान देने की बात है कि धान एक मात्र ऐसी फसल है जिसकी खेती देश के सभी राज्यों में होती है। भारत चावल का सबसे प्रमुख निर्यातक देश बना हुआ है। 

केन्द्रीय पूल में चावल का अत्यन्त विशाल स्टॉक मौजूद है और राइस मिलर्स के पास जो सरकारी धान कस्टम मिलिंग के लिए पड़ा हुआ है उससे भी भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को भारी मात्रा में चावल प्राप्त होने वाला है जिससे इसका कुल स्टॉक काफी बढ़ जाएगा। 

केन्द्र सरकार पहले से ही धान के उत्पादन क्षेत्र को घटाने का प्लान बना रही है। केन्द्रीय कृषि मंत्रालय इसके क्षेत्रफल में 50 लाख हेक्टेयर की कटौती की इच्छा व्यक्त कर चुका है मगर किसान इसकी खेती छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। पंजाब तथा हरियाणा जैसे राज्यों में किसानों को प्रलोभन भी दिया गया कि यदि वे धान का रकबा घटाकर अन्य फसलों का बिजाई क्षेत्र बढ़ाएंगे तो उन्हें सरकार की तरफ से वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। लेकिन यह योजना भी विशेष कारगर साबित नहीं हुई।

अब छत्तीसगढ़ सरकार ने धान के उत्पादन क्षेत्र में 50 हजार हेक्टेयर की कटौती का लक्ष्य नियत करते हुए ऐलान किया है कि धान के बदले दलहन फसलों की खेती करने वाले किसानों को 15,000 रुपए प्रति एकड़ की दर से वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि पंजाब की भांति छत्तीसगढ़ भी केन्द्रीय पूल में चावल का योगदान देने वाला एक अग्रणी राज्य है। इस सूची में तेलंगाना, उड़ीसा एवं हरियाणा जैसे राज्य भी शामिल हैं।