<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss  xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">

    <channel>
        <atom:link type="application/rss+xml" rel="self" href="https://igrain.in/feeds"/>
        <title><![CDATA[ Igrain India ]]></title>
        <link><![CDATA[ https://igrain.in/feeds ]]></link>
        <description><![CDATA[ Igrain India ]]></description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 08:21:51 +0530</pubDate>
  
                    <item>
                <title><![CDATA[मानसून के पश्चिमी तट एवं मध्य भारत की ओर बढ़ने के संकेत]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">तिरुअनंतपुरम। लगभग एक पखवाड़े तक ठहराव और सुस्त रहने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून के सक्रिय होने तथा पश्चिमी तट एवं मध्यवर्ती भरता में आगे बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। मौसम विभाग का कहना है कि मानसून अगले 36 से 48 घंटे के अन्दर मुंबई पहुंच सकता है। अपने आगमन के बाद मानसून पहली बार कुछ तेजी के साथ आगे बढ़ सकता है। इससे खासकर महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सूखे इस प्रभावित खेतों में नमी बढ़ेगी और किसानों को खरीफ फसलों की बिजाई की रफ़्तार बढ़ाने का अवसर मिल सकेगा। महाराष्ट्र में अभी तक इस बार मानसून की वर्षा का विवरण निराशाजनक रहा है।</span><br></p><p>मौसम विभाग के मुताबिक एक गुजरते मेडेन जुलियन ऑसिलेशन (एमजेओ) के प्रभाव से मानसून की सक्रियता बढ़ी है। हालांकि इससे भारी वर्षा होने की उम्मीद रहती है मगर अक्सर सीमित बारिश ही हो पाती है। पश्चिमी तट पर बरसार 10-12 जून को ही आरम्भ हो जानी चाहिए थी लेकिन इस बार मानसून काफी लेट हो गया। वैसे ख्रेफ़ फसलों की बिजाई के लिए अभी पर्याप्त समय बाकी है इसलिए इस बारिश से किसानों का उत्साह अवश्य बढ़ेगा। मध्यवर्ती भारत भी इस वर्ष से लाभान्वित होगा।</p><p>अरब सागर में हलचल तेज हो गयी है। वहां मानसून की शाखा का ढांचा मजबूत होने लगा है। थोड़ी-बहुत हलचल बंगाल की खाड़ी के ऊपर भी देखी जा रही है। वहां कम दाब का क्षेत्र बन रहा है। इससे मानसून को न केवल मजबूती मिलेगी बल्कि आगे बढ़ने का सहारा भी प्राप्त होगा। दक्षिण भारत के तमिलनाडु में वर्षा का दौर पहले से ही जारी है।</p><p>उपग्रह से प्राप्त चित्र से पता चलता है कि मानसून के बादलों का एक व्यवस्थिर एवं संगठित ट्रफ़ पश्चिमी तट की ओर पणजी एवं रत्नागिरी से आगे बढ़ते हुए मंगलोर, तटीय कर्नाटक एवं केरल होते हुए दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। लेकिन मुंबई के ऊपर केवल हल्के बादल ही कहीं-कहीं देखे जा रहे हैं। केरल में बादलों का ट्रफ़ त्रिशूर से लेकर तिरुअनंतपुरम तक फैला हुआ है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34147</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:50:41 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[भारत 1 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात लक्ष्य की दिशा में अग्रसर]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-1-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मुंबई। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री ने कहा है कि वित्त वर्ष 2026-27 (अप्रैल-मार्च) के लिए भारत से वाणिज्यिक वस्तुओं के निर्यात का लक्ष्य बढाकर 1 ख़रब (ट्रिलियन) डॉलर निर्धारित किया गया है और देश इस महत्वकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने हेतु सहित दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संकट के बावजूद भारत में निर्यात का प्रदर्शन बेहतर बना हुआ है। इस लक्ष्य का 15 प्रतिशत से अधिक भाग पहले ही हासिल हो चुका है।</span><br></p><p>वाणिज्य मंत्री के अनुसार विभिन्न देशों/क्षेत्रों के साथ किए गए मुफ्त व्यापार समझौते (एफटीए) तथा व्यवसाय करने में सरलता (ईज़ ऑफ़ डूइंग बिजनेस) के कारण भारत को यह निर्यात लक्ष्य प्राप्त करने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी और निर्यातक अपनी ओर से निर्यात बढ़ाने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं।</p><p>मंत्री महोदय के अनुसार भारत और अमरीका ने अपन प्रस्ताविक व्यापार समझौते के लिए फ्रेमवर्क को अंतिम रूप दे दिया है लेकिन जब तक भारत को अन्य प्रतिद्वंद्वी निर्यातक देशों की तुलना में सीमा शुल्क में ज्यादा रियायत नहीं मिल जाती तब तक यह करार प्रभावी नहीं हो सकेगा। भारत को अमरीका में अपने उत्पादों के निर्यात में सीमा शुल्क में ज्यादा छूट मिलने की उम्मीद है और इसके लिए आवश्यक कदम भी उठाए जा रहे हैं। जब अमरीका इस पर पूरी तरह सहमत होगा तभी यह समझौता वास्तविक अर्थ में लागू होगा।</p><p>सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर का जो निर्यात लक्ष्य निर्धारित किया है वह हासिल करने योग्य है। अगले पांच साल में वार्षिक निर्यात लक्ष्य को बढ़ाकर 2 ट्रिलियन डॉलर नियत किया जाएगा और वह भी पहुंच की सीमा से बाहर नही होगा।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34145</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:28:52 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[नेपाल के मधेश प्रान्त में गेहूं का उत्पादन घटा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">जनकपुरा धाम। भारत के उत्तरी पड़ोसी देश-नेपाल के मधेश प्रान्त में विगत वर्षो की तुलना में इस बार गेहूं का उत्पादन कम हुआ है ज्ञात हो कि इस क्षेत्र की जमीन बहुत उपजाऊ है। मधेश को नेपाल में गेहूं का एक अग्रणी उत्पादक प्रान्त माना जाता है।&nbsp;</span><br></p><p>मधेश प्रान्त के कृषि विकास निदेशालय के अनुसार चालू वर्ष के दौरान राज्य में 3,00,752 हेक्टेयर में गेहूं की बोआई हुई थी और 1.80 टन प्रति हेक्टेयर की औसत उपज दर के साथ इसका कुल उत्पादन 5,43,160 टन पर पहुंच सका। राज्य में गेहूं का सर्वाधिक 98,490 टन उत्पादन धनुष जिले में दर्ज किया गया जहां इसकी बिजाई 35,500 हेक्टेयर में हुई थी और औसत उपज दर 2.94 टन प्रति हेक्टेयर रही।&nbsp;</p><p>इसके बाद रौता हाट जिले में 52,741 टन, सर्लाही जिले में 69,596 टन तथा महोत्तरी जिले में 72,800 टन गेहूं का उत्पादन हुआ। इसके आलावा सप्तरी जिले में 82,320 टन तथा बारां जिले में 71,920 टन गेहूं का उत्पादन दर्ज किया गया। प्रतिकूल मौसम के कारण गेहूं की क्वालिटी भी कमजोर रही। उत्पादन में गिरावट आने से वहां स्थानीय मांग एवं जरूरत को पूरा करने के लिए करीब 50 हजार टन गेहूं के आयात की आवश्यकता पड़ेगी जिसे भारत से मंगाया जा सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34143</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:27:28 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मानसूनी वर्षा की कमी 42 प्रतिशत पर पहुंचने से खरीफ बिजाई में देरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-42-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानसून की गति सुस्त एवं सक्रियता कम रहने से राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ष बारिश की कमी सामान्य औसत स्तर की तुलना में 42 प्रतिशत पर पहुंच गयी है। इससे न केवल खरीफ फसलों की बिजाई में देरी हो रही है बल्कि उसकी उपज दर में गिरावट आने की आशंका भी बढ़ गयी है। हालात ज्यादा गंभीर होने पर किसानों के पास दो ही विकल्प मौजूद होंगे कि या तो खेतों को खासी छोड़ दिया जाए या फिर छोटी अवधि में पक कर तैयार होने वाली किसानों की फसलों की खेती पर ध्यान दिया जाए।</span><br></p><p>चालू वर्ष के दौरान वर्षा पर आश्रित देश के मध्यवर्ती राज्यों में अभी तक बारिश का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। प्राप्त सूचना के अनुसार सामान्य औसत के मुकाबले महाराष्ट्र में 82 प्रतिशत, झारखण्ड में 69 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 67 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 48 प्रतिशत तथा उड़ीसा में 47 प्रतिशत कम बारिश हुई है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सोयाबीन का सर्वाधिक उत्पादन होता है। यदि शीघे ही मानसून सक्रिय नहीं होता है और वर्षा की कमी का यह विशाल अंतर नहीं घटता है तो दलहन,&nbsp; तिलहन, धान एवं कपास जैसी फसलों की खेती में काफी देर हो सकती है।</p><p>जिन इलाकों में बारिश का सर्वाधिक अभाव बना हुआ है वहां अगर अगले दो सप्ताह के दौरान मानसून पूरी तरह सक्रिय नहीं होता है तो किसान सोयाबीन एवं मक्का जैसी फसलों की तरफ तेजी से आकर्षित हो सकते हैं क्योंकि इसकी परिपक्वता अधिक अपेक्षाकृत छोटी होती है।</p><p>महाराष्ट्र के मराठवाडा संभाग में किसान अभी बारिश की इन्तजार कर रहे हैं ताकि अरहर (तुवर) की बिजाई आरंभ की जा सके। लातूर के किसानों का कहना है कि अगर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अच्छी वर्षा नहीं हुई तो वे तुवर को छोड़कर सोयाबीन की बिजाई आरम्भ कर देंगे। सोयाबीन की फसल को पानी की अपेक्षाकृत कम जरुरत पड़ती है और इसकी अवधि भी छोटी होती है। मक्का के साथ भी यही स्थिति लागू होती है।</p><div><br></div>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34141</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 15:45:56 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[यूरिया से लदे 10-12 जहाजों ने होर्मुज स्टूैट को पार किया]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-10-12-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। यूरिया को लदे 16 जहाज होर्मुज स्टूैट के उस पार खड़े थे और जब ईरान-अमरीका के बीच शांति समझौता होने पर होर्मुज स्टूैट को खोला गया तब 10-12 जहाज उस जल क्षेत्र से तेजी से आगे निकलकर भारत की ओर बढ़ गए। उसके पश्चात ईरान ने पुनः होर्मुज स्टूैट को बंद कर दिया।&nbsp;</span><br></p><p>आपूर्ति एवं उपलब्धता बढ़ने से यूरिया की कीमतो में नरमी आने की उम्मीद है वैश्विक बाजार मूल्य भी नरम पड़ने लगा है जिससे भारत में इसके आयात का खर्च घट सकता है है प्राप्त सूचना के अनुसार ईरान युद्ध शुरू होने के समय जो 16 जहाज होर्मुज स्टूैट के पास समुद्र में फस गए थे उसमे से 8 जहाजों पर यूरिया, 4 पर डीएपी, 3 पर सल्फर तथा एक जहाज पर अमोनिया लदा हुआ था।&nbsp;</p><p>जानकारों के अनुसार इसमें से कुछ जहाज होर्मुज स्टूैट को पार करने में सफल हो गया है और अगले कुछ दिनों में भारत पहुंच सकता है बेशक ईरान ने एक बार फिर होर्मुज को बंद कर दिया है मगर अमरीका इसे खुलवाने का हर सम्भव प्रयास कर रहा है। ईरान ने भी कहा है कि अगर इजरायल दक्षिणी जेबनाम पर हमला बंद करता है तो होर्मुज को पुनः खोल दिया जाएगा। भारत में खरीफ फसलों की बिजाई आरम्भ हो चुकी है और किसानो को उर्वरको की पर्याप्त आपूर्ति सुनश्चित की जा रही है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34139</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 15:40:40 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कनाडा में मसूर एवं मटर बाजार को 30 जून की रिपोर्ट का इंतजार]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-30-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">वैंकुवर। पश्चिमी कनाडा में प्रेपरीज संभाग के प्रमुख उत्पादक राज्यों सस्कैच्वान, अल्बर्टा एवं मनिटोबा में बिजाई की प्रक्रिया लगभग समाप्त होने के बाद अब मसूर तथा मटर के कारोबारियों/निर्यातकों को 30 जून की उस रिपोर्ट का इंतजार है जिसे सरकारी एजेंसी -स्टैट्स्कैन द्वारा जारी किया जाएगा और जिसमे अन्य फसलों के साथ मसूर तथा मटर के भी क्षेत्रफल, विकास तथा बकाया स्टॉक आदि का विवरण दिया जाएगा।&nbsp;</span><br></p><p>कनाडा तथा अमरीका में व्यापारियों/निर्यातकों द्वारा दलहन फसलों की प्रगति एवं मौसम की स्थिति पर गहरी नजर रखी जा रही है क्योंकि फसलों की प्रगति एवं मौसम की स्थिति पर गहरी नजर रखी जा रही है क्योंकि इस पर ही बाजार की आगामी दशा एवं दिशा का निर्धारण हो सकेगा। अभी इस बात का अनुमान लगाना कठिन है कि दलहन फसलों की खेती के प्रति किसानो ने अप्रैल में जो धारणा /योजना बनाई थी उसमे ज्यादा बदलाव हुआ है या नहीं। मध्य पूर्व एशिया में भी स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। तेल-गैस का आयात बाधित हो रहा है और इसका खर्च बढ़ गया है।&nbsp;</p><p>सीमित कारोबार के कारण मसूर तथा मटर का भाव काफी हद तक स्थिर बना हुआ है। भारत में भी खरीफकालीन दलहनों की बिजाई पर नजर रखी जा रही है। इसका क्षेत्रफल गत वर्ष से पीछे चल रहा है। कनाडा में मसूर एवं मटर का नया माल अगस्त-सितंबर में आने लगेगा।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34137</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 14:42:15 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[होर्मुज़ के बंद होने से बासमती चावल का निर्यात हो सकता है प्रभावित]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। लेबनान पर इजरायल का हमला जारी रहने के विरोध में ईरान ने एक बार फिर होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा की है जिस इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से व्यावसायिक जहाजों का आवागमन अवरुद्ध हो गया है इसके फलस्वरूप भारत से बासमती चावल और चाय के निर्यात पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है। निर्यातकों का कहना है कि पश्चिम एशिया, मध्य पूर्व एवं खाड़ी क्षेत्र के देशों में निर्यात घटने या अटकने पर बासमती चावल के दाम में 5 से 10 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।</span><br></p><p>ईरान, अमरीका के बीच अंतरिम शांति समझौता होने के बाद जब होर्मुज स्ट्रेट को खोलने पर सहमती बनी थी तब भारतीय निर्यातकों ने राहत की सांस ली थी और ऐसा लगने लगा कि अब हालात सामान्य हो जायेंगे और भारत से निर्यात होने की उम्मीद से घरेलू प्रभाग में बासमती चावल की भारी खरीदारी आरम्भ कर दी जिससे इसके दाम में 15-20 प्रतिशत तक का इजाफा हो गया। इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन का कहना है कि ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरू मध्य को अचानक बंद करने का निर्णय लिए जाने से बासमती चावल का भाव नरम पड़ जाएगा।</p><p>समझा जाता है कि पश्चिम एशिया के देशों के लिए हाल में करीब 60 हजार टन बासमती चावल की खेप भेजी गयी थी जो अभी रास्ते में ही है। होर्मुज़ के बंद होने से इस का भविष्य अनिश्चित हो गया है। पश्चिम एशिया में भारतीय बासमती चावल के पांच शीर्ष खरीदार देशों में सऊदी अरब, ईरान, ईराक, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) तथा यमन शामिल है। भारत से बासमती केवल के कुल वार्षिक निर्यात का लगभग 50 प्रतिशत भाग इन देशों में ही भेजा जाता है। इसके अलावा वहां क़तर, जॉर्डन, कुवैत एवं बहरीन जैसे देश भी इसका आयात करते हैं।</p><p>भारत में 72 लाख टन से अधिक बासमती चावल का सालाना घरेलू उत्पादन होता है जिसमें से लगभग 60 लाख टन का निर्यात दुनिया के विभिन्न देशों को कर दिया जाता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34135</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 13:48:31 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[केन्द्रीय पूल में विशाल स्टॉक से गेहूं बाजार पर दबाव कायम]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। रबी सीजन के सबसे प्रमुख खाद्यान्न -गेहूं की सरकारी खरीद अभियान लगभग बंद हो चुका है लेकिन इस बार पहले ही विशाल खरीद होने तथा भारी-भरकम पिछला बकाया स्टॉक मौजूद रहने से केंद्रीय पूल में इसका कुल भंडार बढ़कर 500 लाख टन से भी आगे निकल गया है जो वर्ष 2021 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है इसमें 232 लाख टन यू आर एस श्रेणी का तथा शेष सामान्य औसत क्वालिटी का गेहूं शामिल है।&nbsp;</span><br></p><p>सुरक्षित भण्ड़ारण की समस्या को देखते हुए प्रतीत होता है कि खाद्य मंत्रालय जल्दी ही भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को खुले बाजार बिक्री योजना (ओ एम एम एस) के अंतर्गत अपने स्टॉक से गेहूं बेचने की स्वीकृति दे सकता है जबकि थोक मंडियों में भी अच्छी आवक हो रही है। इसके फलस्वरूप गेहूं बाजार पर आपूर्ति का दबाव बना हुआ है और इसका भाव सरकारी समर्थन मूल्य 2585 रूपए प्रति क्विंटल से नीचे चल रहा है।&nbsp;</p><p>इस बार सरकार ने 50 लाख टन गेहूं तथा 10 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति प्रदान की है लेकिन इसके अनुबंध एवं शिपमेंट की गति सुस्त बनी हुई है। निर्यातकों द्वारा अत्यंत सीमित मात्रा में मार्किट से गेहूं खरीदा जा रहा है जबकि मिलर्स/प्रोसेसर्स मांग सामान्य बनी हुई है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34131</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 13:06:57 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कम तथा असमान वर्षा से दलहन-तिलहन की खेती पर ख़तरा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। अल नीनों के दुष्प्रभाव से इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने की सम्भावना है जिससे जून-सितम्बर के चार महीनों की अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर न केवल बारिश कम होगी बल्कि इसका वितरण भी असमान रह सकता है। इससे खासकर खरीफ कालीन दलहन-तिलहन फसलों की बिजाई एवं औसत उपज दर प्रभावित होने की आशंका है। हालांकि ऊंचे बाजार भाव के कारण चालू खरीफ सीजन में भारतीय किसान सोयाबीन, मूंगफली, तिल, सूरजमुखी एवं अरंडी जैसी महत्वपूर्ण तिलहन फसलों का क्षेत्रफल बढाने के मूड में हैं लेकिन इसके लिए उन्हें मानसूनी वर्षा का पर्याप्त मजबूत सहारा मिलने में संदेह हैं।</span><br></p><p>दलहन फसलों के संवर्ग में खरीफ सीजन के दौरान मुख्यतः अरहर (तुवर), उड़द एवं मूंग की खेती होती है जबकि मोठ, कुल्थी एवं खेसारी जैसे दलहनों की बिजाई भी सीमित क्षेत्रफल में की जाती है। दलहन-तिलहन फसलों का रकबा अभी गत वर्ष से पीछे चक रहा है क्योंकि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, गुजरात एवं तेलंगाना सहित अन्य प्रमुख उत्पादक राज्यों में मानसूनी वर्षा का अभाव बना हुआ है।</p><p>मौसम विभाग ने आगामी दिनों के दौरान देश के अनेक राज्यों में मानसून की सक्रियता बढ़ने तथा अच्छी बारिश होने की सम्भावना व्यक्त की है जिससे अन्य फसलों के साथ दलहन-तिलहन की बिजाई की रफ़्तार भी बढ़ने की उम्मीद है। बिजाई में कुछ देर अवश्य हो रही है लेकिन अगर आगे अच्छी वर्षा हुई तो क्षेत्रफल में गिरावट का अंतर काफी हद तक कम हो सकता है।</p><p>केंद्र सरकार ने इस बार भी तुवर, उडाद, सोयाबीन, मूंगफली, सूरजमुखी एवं तिल के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोत्तरी कर दी है जिससे किसानों को इसका रकबा एवं उत्पादन बढ़ाने का अच्छा अवसर मिल सकत है। लेकिन इसके लिए मानसून का अनुकूल रहना आवश्यक है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34129</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 12:38:51 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[अलनीनो से उत्पन्न संकट पर गहरी नजर रखने की जरूरत]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मुंबई। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री ने कहा है कि अलनीनो एक वैश्विक संकट है और इसलिए इससे उत्पन्न होने वाली समस्याओ के विभिन्न पहलुओं पर गहरी नजर रखने की जरूरत है। सरकार खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोत्तरी की घोषणा पहले ही कर चुकी है जबकि&nbsp; रासायनिक उर्वरको पर सब्सिडी को बरकरार रखा गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान, दलहन, तिलहन एवं कपास (रुई) आदि&nbsp; की जोरदार खरीद आगे भी जारी रहेगी ताकि किसानो को लाभप्रद वापसी शामिल हो सके। .</span><br></p><p>अल नीनो एवं कमजोर मानसून के संभावित प्रभाव पर केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारे भी गहरी नजर रख रही है और पानी की कमी सहित अन्य सभी प्रकार की चुनौतियो का सामना करने के लिए हर सम्भव उपाय किए जायेंगे। पानी के आभाव को दूर करने के लिए सरकार तैयार है और देश के कृषक समुदाय के हितो की रक्षा के लिए सभी आवश्यक प्रयास किये जा रहे है। महाराष्ट्र सरकार तैयार है और देश के कृषक समुदाय के हितो की रक्षा के लिए सभी आवश्यक प्रयास किए जा रहे है। महाराष्ट्र सरकार भी&nbsp; स्थिति को संभालने के लिए जोरदार कोशिश कर रही है। किसान सरकार की प्राथमिकता है और इसके कल्याण के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाएगी। भारतीय किसान समझदार है और वे इस स्थिति के अनुरूप ही खरीफ फसलों का चुनाव करेंगे। लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34127</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 11:26:50 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[बांग्लादेश से कच्चे काजू पर प्रस्तावित शुल्क वृद्धि से भारत को होगा फायदा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">ढाका। बांग्लादेश में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पेश किए गए बजट में कच्चे काजू पर शुल्क में भारी बढ़ोत्तरी का प्रस्ताव रखा गया है जिससे वहां इसका प्रसंस्करण खर्च तथा प्रसंस्कृत काजू का मूल्य काफी बढ़ जाएगा। दूसरी ओर साफ्टा संधि के तहत भारत से आयातित देश में प्रसंस्कृत काजू पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इससे बंगलदेश में प्रसंस्कृत काजू का भाव भारत से आयातित माल की तुलना में&nbsp; 471 टका प्रति किलो ऊंचा हो जाएगा।</span><br></p><p>बांग्लादेश में अभी तक कच्चे काजू पर 13.58 प्रतिशत का आयात शुल्क लागू है जिसे बढ़ाकर 40.38 प्रतिशत निश्चित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इससे वहां प्रसंस्कृत इकाइयों में प्रोसेस्ड काजू भारत से आयातित प्रसंस्कृत काजू के मुकाबले गैर प्रतिस्पर्धी हो जाएगा।</p><p>बांग्लादेश में काजू प्रोसेसिंग की करीब 20 इकाइयों पर इस प्रस्तावित शुल्क वृद्धि का गहरा प्रतिकूल असर पड़ सकता है और उस उद्योग में आगे पूंजी निवेश की सम्भावना समाप्त हो सकती है। उद्योग ने विदेशों (खासकर भारत) से आयातित प्रसंस्कृत काजू पर 20 प्रतिशत का पूरक शुल्क लगाने का आग्रह सरकार से किया है।</p><p>उद्योग विश्लेषकों के मुताबिक 1 किलो प्रसंस्कृत काजू के निर्माण के लिए औसतन 5 किलो कच्चे काजू की आवश्यकता पड़ती है। वहां मुख्यतः अफ्रीकी देशों से कच्चे काजू एवं भारत से प्रसंस्कृत काजू का आयात किया जाता है। बजट प्रस्ताव के अनुसार कच्चे काजू पर 15 प्रतिशत का आयात शुल्क एवं 15 प्रतिशत का वैट सहित कुल 40.88 प्रतिशत का शुल्क लगाया जाएगा जो फ़िलहाल 13.58 प्रतिशत ही है।</p><p>उद्योग समीक्षकों के मुताबिक बांग्लादेश में शुल्क वृद्धि के बाद विदेशों से आयातित कच्चे काजू से निर्मित प्रसंस्कृत काजू का मूल्य बढ़कर 1725 टका प्रति किलो हो जाएगा जो भारत से आयातित प्रोसेस्ड काजू के खर्च 1282 टका प्रति किलो से करीब 471 टका प्रति किलो ऊंचा रहेगा। ऐसी स्थिति में भारत से आयात तेजी से बढ़ने की सम्भावना रहेगी।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34125</guid>				
                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 11:24:40 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[महाराष्ट्र में 23 जून के आसपास मानसून बढ़ सकता है आगे]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-23-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि करीब दो सप्ताहों के ठहराव के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून अब 23 जून के आसपास देश के पश्चिमी भाग में आगे बढ़ सकता है क्योंकि मौसमी परिस्थितियां अनुकूल होने लगी है।</span></p><p><span style="font-size: 1rem;"> महाराष्ट्र में बारिश की कमी से अरहर, सोयाबीन, कपास एवं अन्य खरीफ फसलों की बिजाई की गति बहुत धीमी है और राज्य सरकार की ओर से किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे फसलों की खेती में जल्दबाजी न दिखाएं तथा मानसून की अच्छी वर्षा का इंतजार करें।</span></p><p>मानसून का पश्चिमी ट्रफ 8 जून से ही महाराष्ट्र के सोलापुर तथा हरनई में स्थिर अवस्था में पड़ा हुआ है लेकिन अगले सप्ताह से इसके न केवल आगे बढ़ने बल्कि ज्यादा सक्रिय होने की भी उम्मीद है। मानसून के ट्रफ का विस्तार तेलंगाना, उड़ीसा, झारखंड एवं बिहार तक होने के आसार हैं। </p><p>पूर्वी सिरा बंगाल तथा सिक्किम तक पहले ही पहुंच चुका है। छत्तीसगढ़ के कुछ भागों में भी बारिश होने की संभावना है। वर्तमान समय में मानसून का एक ट्रफ हरनई, सोलापुर, हैदराबाद, भद्राचलम, कोरापुट, फुलबनी, रांची, मुजफ्फरपुर एवं जमुई से होकर गुजर रहा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34081</guid>				
                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:53:02 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कमजोर निर्यात प्रदर्शन के कारण जीरा की कीमतों में जोरदार तेजी नहीं]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">राजकोट। सबसे प्रमुख खरीदार देश- चीन की मांग कमजोर रहने तथा पश्चिम एशिया में फैली अशांति के कारण डिस्पैच में बाधा पड़ने के कारण वित्त वर्ष 2025-26 (अप्रैल-मार्च) के दौरान भारतीय जीरे का निर्यात प्रदर्शन काफी कमजोर पड़ गया। मसाला बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार भारत से वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान करीब 2.29 लाख टन जीरा का निर्यात हुआ था जो वित्त वर्ष 2025-26 में 14 प्रतिशत गिरकर 1.96 लाख टन पर सिमट गया। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">समीक्षाधीन अवधि में इसकी निर्यात आय भी 73.235 करोड़ डॉलर से 28 प्रतिशत घटकर 52.40 करोड़ डॉलर तथा भारतीय मुद्रा में निर्यात आमदनी 6178.86 करोड़ रुपए से 25 प्रतिशत घटकर 4611.15 करोड़ रुपए रह गई। जीरा का औसत निर्यात ऑफर मूल्य भी नीचे रहा।</span></p><p>चीन में बेहतर घरेलू उत्पादन एवं ऊंचे बकाया स्टॉक के कारण जीरा के आयात में 76 प्रतिशत की जोरदार गिरावट आ गई। वहां 2024-25 में भारत से 38,721 टन जीरा का शानदार आयात हुआ था जो 2025-26 में लुढ़ककर 9271 टन पर अटक गया। </p><p>चीन को हुए जीरा के निर्यात से आमदनी भी 11.451 करोड़ डॉलर से 80 प्रतिशत घटकर 2.281 करोड़ डॉलर पर अटक गई। पिछले साल चीन में जीरा का उत्पादन बढ़कर 85-90 हजार टन के करीब पहुंच गया जिससे उसे भारत से इस महत्वपूर्ण मसाले का आयात घटाने में सफलता मिल गई।&nbsp;</p><p>पश्चिम एशिया तथा उत्तरी अफ्रीका (मेना) क्षेत्र में भी भारत से जीरा का निर्यात प्रभावित हुआ क्योंकि ईरान-अमरीका युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट का जल मार्ग बंद हो गया था। </p><p>इतना ही नहीं बल्कि इस अवधि के दौरान अमरीका, संयुक्त अरब अमीरत (यूएई), बांग्ला देश एवं ब्रिटेन सहित कई अन्य प्रमुख आयातक देशों में भी भारत से जीरा का निर्यात घट गया जबकि तुर्की में निर्यात कुछ बेहतर रहा।&nbsp;</p><p>वर्तमान समय में भी भारतीय जीरा का निर्यात प्रदर्शन ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं है जबकि देश में इस मसाले का भारी स्टॉक मौजूद है। पिछले महीने ही फसल की कटाई-तैयारी समाप्त हुई है। घरेलू मांग भी अभी कमजोर ही है। कीमतों में सीमित उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34079</guid>				
                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 12:29:53 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[जुलाई में सीपीओ का भाव मजबूत रहने की संभावना]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">कुआलालम्पुर। सबसे प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देश- इंडोनेशिया में आपूर्ति की स्थिति जटिल रहने, अल नीनो का खतरा बढ़ने तथा वैश्विक बाजार में वनस्पति तेल की कारोबारी गतिविधियां सुधरने जैसे कारकों को देखते हुए मलेशियन पाम ऑयल कौंसिल (एम्पोक) ने जुलाई 2026 में क्रूड पाम तेल (सीपीओ) का वायदा मूल्य 4400 से 4650 रिंगिट प्रति टन के बीच मजबूत रहने का अनुमान लगाया है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">कौंसिल के मुताबिक यद्यपि जून तक इंडोनेशिया और मलेशिया में ऑयल पाम के बागानों पर अल नीनो मौसम चक्र का कोई प्रभाव नहीं रहेगा लेकिन जुलाई या अगस्त से इसका खतरा बढ़ने की संभावना है।&nbsp;</span></p><p>इंडोनेशिया में 1 जुलाई बी 50 प्रोग्राम लागू होने वाला जिससे वहां बायोडीजल के निर्माण में पाम तेल के अनिवार्य मिश्रण का स्तर बढ़कर 50 प्रतिशत पर पहुंच जाएगा। इससे वहां निर्यात उद्देश्य के लिए पाम तेल उत्पादों का स्टॉक सीमित हो सकता है।&nbsp;</p><p>एम्पोक के कारण प्रमुख आयातक देशों में वनस्पति तेलों का अच्छा खासा स्टॉक मौजूद है इसलिए पाम तेल की मांग एवं&nbsp; कीमत में जबरदस्त इजाफा होना मुश्किल है लेकिन जून के मुकाबले जुलाई में बाजार ऊंचा रह सकता है। 28 मई को भाव 3899 रिंगिट प्रति टन रहा था।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34077</guid>				
                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:58:16 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कमजोर मानसून का प्रभाव]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">अमरीकी जलवायु पूर्वानुमान केन्द्र ने इस वर्ष एक शक्तिशाली एवं मजबूत अल नीनो के सक्रिय रहने की संभावना व्यक्त करते हुए कहा है कि इस मौसम चक्र के 'सुपर अल नीनो' बनने के 63 प्रतिशत आसार हैं। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">आम तौर पर अल नीनो से दुनिया का अधिकांश भाग प्रभावित होता है जिसमें एशिया, उत्तरी अमरीका, दक्षिणी अमरीका तथा ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप शामिल है। ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश भाग तथा दक्षिण एशिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों पर इसका गहरा प्रतिकूल असर पड़ता रहा है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">अल नीनो खासकर भारतीय मानसून के लिए खतरनाक माना जाता है। प्रशांत महासागर में उत्पन्न हुआ अल नीनो अब दक्षिण-पश्चिम मानसून का रास्ता रोक रहा है जिससे भारत में वर्षा की भारी कमी महसूस की जा रही है। इस बार मानसून न केवल कमजोर है बल्कि इसके आगे बढ़ने की रफ्तार भी काफी धीमी है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">बंगाल की खाड़ी एवं अरब सागर के ऊपर सघन बादलों के झुण्ड का तेजी से निर्माण नहीं हो रहा है और न ही वहां हवा के प्रवाह की स्थिति अनुकूल देखी जा रही है। अगले कुछ दिनों में स्थिति बेहतर हो सकती है मगर तब तक राष्ट्रीय स्तर पर वर्षा की कमी बढ़कर 40-45 प्रतिशत तक पहुंच जाने की आशंका है। दुर्भाग्य से इस बार देश के 166 प्रमुख बांधों-जलाशयों में पानी का स्तर भी घटकर उसकी कुल भंडारण क्षमता का महज 27-28 प्रतिशत रह गया है।&nbsp;</span></p><p>दक्षिण-पश्चिम मानसून खरीफ फसलों के लिए ऑक्सीजन माना जाता है। जून से सितम्बर के चार माह की अवधि में होने वाली मानसूनी बारिश खरीफ फसलों पर प्रत्यक्ष रूप से तथा रबी फसलों पर परोक्ष रूप से सकारात्मक असर डालती है। </p><p>यदि कमजोर मानसून की वजह से वर्षा कम, अनियमित एवं अनिश्चित होती है और इसका वितरण असमान तथा अंतराल लम्बा होता है तो स्वाभाविक रूप से खरीफ फसलों पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा और उसकी उपज दर तथा पैदावार में कमी आएगी। इससे खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34072</guid>				
                <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:04:23 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मुनाफावसूली बिकवाली से घट सकते हैं धनिया के भाव : मगर अधिक मंदा नहीं]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p style="text-align: justify; "><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। चालू सप्ताह के दौरान धनिया की कीमतों में 8/10 रुपए प्रति किलो तेजी दर्ज की गई है। क्योंकि मिडिल ईस्ट देशों में शांति के चलते वायदा एवं हाजिर बाजारों में धनिया के भाव नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए। सूत्रों का मानना है कि ऊंचे भावों पर बाजार में मुनाफावसूली बिकवाली बढ़ सकती है जिस कारण से अल्पकाल के लिए भाव कुछ घट सकते हैं लेकिन अधिक मन्दा संभव नहीं है। वर्तमान में उत्पादक केन्द्रों पर ईगल क्वालिटी का भाव 140/145 रुपए एवं बादामी का भाव 130/135 रुपए पर बोला जाने लगा है। सूत्रों का कहना है कि खपत की तुलना में उपलब्धता कम रहने के कारण आगामी दिनों में बाजार फिर 8/10 रुपए प्रति किलो बढ़ सकते हैं बशर्ते आयात न हो।&nbsp;</span></p><p style="text-align: justify; ">उल्लेखनीय है कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिलने के कारण विगत 2/3 वर्षों से देश में धनिया की पैदावार घट रही है। इसके अलावा बकाया स्टॉक भी घट रहा है। धनिया का मुख्यतः उत्पादन गुजरात, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में होता है। मंडियों में नई फसल की आवक फरवरी-मार्च माह में शुरू हो जाती है।&nbsp;</p><p style="text-align: justify; "><b>घटता उत्पादन&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; ">विगत दो-तीन वर्षों से देश में धनिया का उत्पादन घटता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2023 में देश के धनिया का रिकॉर्ड उत्पादन 1.60 करोड़ बोरी का रहा था जोकि वर्ष 2024 में घटकर 1.20 करोड़ बोरी एवं वर्ष 2025 में 1.10 करोड़ रह गया। जबकि वर्ष 2026 में घटकर 95/97 लाख बोरी पर आने के व्यापारिक अनुमान लगाए जा रहे हैं। चालू सीजन के दौरान मध्य प्रदेश में धनिया की पैदावार 43/44 लाख बोरी एवं गुजरात में 38/40 लाख बोरी होने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। इसके अलावा राजस्थान में 12/13 लाख बोरी धनिया की पैदावार मानी जा रही है।&nbsp;</p><p style="text-align: justify; "><b>आवक&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; ">कुल उत्पादन का अधिकांश माल मंडियों में आ जाने के कारण मंडियों में दैनिक आवक घटनी शुरू हो गई है। सूत्रों का कहना है कि गुजरात में अभी तक लगभग 80 प्रतिशत माल आ चुका है इसके अलावा मध्य प्रदेश की मंडियों में भी 65/70 प्रतिशत माल आ चुका है। राजस्थान की मंडियों में भी 70/75 प्रतिशत धनिया में मंडियों के आने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। वर्तमान में गुजरात की प्रमुख मंडी गोंडल में धनिया की आवक 4/5 हजार बोरी की रह गई है जबकि राजस्थान की रामगंज मंडी में 2000/2500 बोरी की रह गई है। मध्य प्रदेश की गुणा मंडी में आवक 4/5 हजार बोरी&nbsp; जबकि अन्य मंडियों में नीमच, अशोकनगर, मंदसौर, बीनागंज में 500/700 बोरी की आवक चल रही है। वर्तमान में मंडियों में ईगल क्वालिटी का भाव 140/145 रुपए एवं बादामी का 130/135 रुपए बोला जा रहा है।&nbsp;</p><p style="text-align: justify; "><b>धारणा तेजी की&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; ">सूत्रों का कहना है कि खपत की तुलना में कुल उपलब्धता कम होने के कारण धनिया बाजार में धारणा तेजी की बनी हुई है। उल्लेखनीय है कि चालू सीजन के दौरान नई पैदावार एवं बकाया स्टॉक को मिलाकर धनिया की कुल उपलब्धता 1.20/1.25 करोड़ बोरी की रहती है जबकि लोकल मांग एवं निर्यात को मिलाकर 1.40/1.50 करोड़ बोरी की आवश्यकता होती है। आगामी दिनों में धीरे-धीरे माल की सप्लाई प्रभावित होने के साथ ही कीमतों में अवश्य ही 10/15 रुपए प्रति किलो की तेजी आने के व्यापारिक अनुमान लगाए जा रहे है।</p><p style="text-align: justify; "><b>निर्यात</b></p><p style="text-align: justify; ">मसाला बोर्ड द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025-26 के दौरान धनिया का कुल निर्यात 60211 टन का रहा और निर्यात से प्राप्त आय 679.70 करोड़ की रही जबकि वर्ष 2024-25 में धनिया का निर्यात 60323 टन का हुआ था और निर्यात से प्राप्त आय 633 करोड़ की रही थी। वर्ष 2023-24 में धनिया का रिकॉर्ड निर्यात 108624 टन का रहा था।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34062</guid>				
                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 19:58:18 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[आंध्र प्रदेश में खरीफ बुवाई 74% बढ़ी, 1.48 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-74-1-48-]]></link>                
                <description><![CDATA[<div style="text-align: justify;"><span style="font-size: 1rem;">आंध्र प्रदेश में खरीफ फसलों का रकबा 18 जून तक बढ़कर 1.48 लाख हेक्टेयर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष के 85 हजार हेक्टेयर की तुलना में 74% अधिक है। राज्य का सामान्य खरीफ रकबा 30.8 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से अब तक लगभग 5% क्षेत्र में बुवाई पूरी हो चुकी है।</span></div><div style="text-align: justify;">धान की बुवाई बढ़कर 65 हजार हेक्टेयर हो गई, जो पिछले वर्ष 46 हजार हेक्टेयर थी। वहीं मक्का का रकबा घटकर 3 हजार हेक्टेयर रह गया, जो एक वर्ष पहले 4 हजार हेक्टेयर था। बाजरा का क्षेत्रफल भी 3 हजार हेक्टेयर से घटकर 1 हजार हेक्टेयर रह गया।</div><div style="text-align: justify;">दलहनों में तूर का रकबा 3 हजार हेक्टेयर से घटकर 2 हजार हेक्टेयर रह गया, जबकि उड़द की बुवाई 1 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 2 हजार हेक्टेयर हो गई। मूंग की बुवाई अभी शुरू नहीं हुई है।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">तिलहनों का कुल रकबा बढ़कर 11 हजार हेक्टेयर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष 8 हजार हेक्टेयर था। मूंगफली का क्षेत्रफल 7 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 9 हजार हेक्टेयर हो गया, जबकि तिल का रकबा 1 हजार हेक्टेयर पर स्थिर रहा। सोयाबीन की बुवाई अभी शुरू नहीं हुई है।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">कपास की बुवाई में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है और इसका रकबा 17 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 58 हजार हेक्टेयर हो गया। गन्ने का क्षेत्रफल भी 2 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 6 हजार हेक्टेयर पहुंच गया।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">1 से 18 जून के दौरान राज्य में 55.6 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य 56.4 मिमी से 1% कम है। दक्षिण-पश्चिम मानसून 12 जून को पूरे राज्य में पहुंच गया था, लेकिन मानसूनी गतिविधियां कमजोर रहने से अब तक वर्षा सामान्य से थोड़ी कम रही है।</div><div style="text-align: justify;"><br></div><div style="text-align: justify;">राज्य के जलाशयों में जल स्तर भी पिछले वर्ष की तुलना में कम है। 20 जून तक जलाशयों में उनकी जीवित भंडारण क्षमता का 39.1% पानी उपलब्ध था, जबकि एक वर्ष पहले यह 41.1% था।</div>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34060</guid>				
                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 19:47:54 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[लालमिर्च की खेती में घातक रसायनों का उपयोग रोकने का आग्रह]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">कुर्नूल। आंध्र प्रदेश के गुंटूर, प्रकाशम, पालनाडु, कुर्नूल तथा नांदयाल जैसे जिलों में उत्पादित लालमिर्च का निर्यात बड़े पैमाने पर चीन सहित दुनिया के कई अन्य देशों को किया जाता है। चीन इसका सबसे बड़ा खरीदार रहा है जहां खासकर तेजा वैरायटी की लालमिर्च को काफी पसंद किया जाता है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">लेकिन चीन के आयातक भारतीय लालमिर्च के प्रति कुछ ज्यादा सतर्क हो गए हैं क्योंकि वहां भारत से भेजी गई इसकी कुछ खेपों के सैम्पल में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रसायनों का अवशेष स्वीकृत सीमा से अधिक पाया गया। इसके फलस्वरूप उन खेपों को वहां नामंजूर करके वापस भेज दिया गया जिससे निर्यातकों को भारी झटका लगा।&nbsp;</span></p><p>चिलीज एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आंध्र प्रदेश के कृषि, सहकारिता एवं मार्केटिगं विभाग को एक पत्र लिखा है जिसमें लालमिर्च की खेती में उन हानिकारक कीटनाशी रसायनों के इस्तेमाल पर&nbsp; &nbsp;पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया गया है। </p><p>इसके साथ-साथ किसानों को उन रसायनों के खतरे के बारे में जानकारी देने के लिए ग्रामीण स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने का भी सुझाव दिया गया है। एसोसिएशन का कहना है कि खेतों के स्तर पर ही इन रसायनों का उपयोग होता है और इसमें निर्यातकों की भागीदारी नहीं रहती है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34057</guid>				
                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 16:46:35 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[सस्कैचवान में फसलों की बिजाई की गति में मामूली सुधार]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">रेगिना। कनाडा के सबसे प्रमुख कृषि उत्पादक प्रान्त-सस्कैचवान में कुछ फसलों की बिजाई का अभियान अभी जारी है। दरअसल पिछले सप्ताह राज्य के कई भागों में भारी वर्षा हुई तथा खेतों की मिटटी में नमी का अंश जरूरत से ज्यादा बढ़ गया।</span></p><p><span style="font-size: 1rem;"> इससे उन फसलों को तो फायदा हो रहा है जिसकी बिजाई पहले से ही हो चुकी है लेकिन आगे की बिजाई में किसानों को ज्यादा सफलता नहीं मिल रही है। वर्षा से फसलों पर कीड़ों-रोगों का खतरा बढ़ गया है।</span></p><p>प्रांतीय कृषि विभाग के अनुसार सस्कैचवान में करीब 97 प्रतिशत चिन्हित क्षेत्र में विभिन्न फसलों की बिजाई पूरी हो चुकी है जो पूर्ववर्ती सप्ताह की बिजाई 93 प्रतिशत से ज्यादा मगर पंचवर्षीय एवं 10 वर्षीय औसत बिजाई 99 प्रतिशत से कुछ कम है।&nbsp;</p><p>सस्कैचवान प्रान्त में गेहूं, कैनोला, मटर एवं मसूर सहित कई अन्य फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। भारत में कनाडा से पीली मटर तथा मसूर का भारी आयात किया जाता है जिसका अधिकांश भाग सस्कैचवान से ही आता है। </p><p>इस राज्य के मध्य पश्चिमी तथा दक्षिणी-पश्चिमी भाग में 99 प्रतिशत क्षेत्र में फसलों की बिजाई समाप्त हो चुकी है जबकि उत्तरी तथा दक्षिण-पूर्वी भाग में 98 प्रतिशत बिजाई पूरी हुई है लेकिन मध्य पूर्वी भाग में बिजाई अभी 90 प्रतिशत तक ही पहुंची है। उम्मीद की जा रही है कि अगर मौसम साफ एवं अनुकूल रहा तो जून के अंत तक बिजाई की प्रक्रिया पूरी तरह बंद हो जाएगी।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34055</guid>				
                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 15:34:54 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[खाद्य जिंसों का पर्याप्त वैश्विक स्टॉक मौजूद होने से कीमतों में भारी तेजी की उम्मीद नहीं]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। हालांकि चालू वर्ष के दौरान मजबूत एवं शक्तिशाली अल नीनो के प्रभाव से दुनिया के कई भागों में मौसम एवं वर्षा की हालत प्रतिकूल रहने की संभावना है जिससे अनाज, दलहन एवं तिलहन सहित अन्य कृषि तथा खाद्य जिंसों के वैश्विक उत्पादन में गिरावट आने तथा भाव ऊंचा एवं तेज रहने का अनुमान लगाया जा रहा है लेकिन बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व स्तर पर इन उत्पादों का पर्याप्त पिछला बकाया स्टॉक उपलब्ध होने से उसकी आपूर्ति की स्थिति कम जटिल होगी और इसलिए कीमतों में अप्रत्याशित या जबरदस्त इजाफा होना मुश्किल है।&nbsp;</span></p><p>समीक्षकों के अनुसार दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक क्षेत्रों में मौसम की हालत लगभग सामान्य रहने की उम्मीद है और खाद्यान्न का वैश्विक स्टॉक भी रिकॉर्ड स्तर के आसपास है। अल नीनो के खतरे को देखते हुए अभाव ग्रस्त&nbsp; आयातक देशों ने सटीक प्लान बनाना शुरू कर दिया है। इसके फलस्वरूप आगामी महीनों में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार मूल्य में सीमित तेजी का ही माहौल बनने की संभावना है।&nbsp;</p><p>अल नीनो की वजह से आमतौर पर एशिया महाद्वीप में गर्मी, अनावृष्टि एवं सूखे का संकट बढ़ जाता है जबकि उत्तरी एवं दक्षिणी अमरीका महाद्वीप में अतिवृष्टि तथा बाढ़ का खतरा बना रहता है। इन दोनों ही मौसमी परिस्थितियों से विभिन्न फसलों को नुकसान की आशंका बनी रहती है।&nbsp;</p><p>पिछली बार की तुलना में इस वर्ष का अल नीनो कुछ ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है इसलिए दुनिया भर के विश्लेषक कृषि उत्पाद बाजार में उतार-चढ़ाव के बारे में तरह-तरह का अनुमान व्यक्त कर रहे हैं। </p><p>खाद्य एवं कृषि संगठन (फाओ) का कहना है कि भारत में चावल एवं गेहूं का उत्पादन बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया और ब्राजील में सोयाबीन का उत्पादन उछलकर सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा। </p><p>ऑस्ट्रेलिया, कनाडा एवं रूस में मसूर का शानदार उत्पादन होने की उम्मीद है जबकि अमरीका, चीन एवं ब्राजील में मक्का के बेहतर उत्पादन के आसार हैं। चीनी का बाजार कुछ तेज रह सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/34053</guid>				
                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 15:29:44 +0530</pubDate>
            </item>
                
    </channel>

</rss>