<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss  xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">

    <channel>
        <atom:link type="application/rss+xml" rel="self" href="https://igrain.in/feeds"/>
        <title><![CDATA[ Igrain India ]]></title>
        <link><![CDATA[ https://igrain.in/feeds ]]></link>
        <description><![CDATA[ Igrain India ]]></description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 14:02:31 +0530</pubDate>
  
                    <item>
                <title><![CDATA[चीन में तीन भारतीय चावल निर्यातकों का लाइसेंस निलंबित]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। करीब एक माह पूर्व चीन ने तीन भारतीय चावल निर्यातकों की खेपों को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया था कि उसमें जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) चावल का अंश मौजूद है। अब चीन ने इन तीनों निर्यातक फर्मों के आयात लाइसेंस को निरस्त कर दिया है। यह निर्णय 17 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो गया है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">चीन स्थित भारतीय दूतावास ने एपीडा को इसकी जानकारी दी है। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय वाणिज्य मंत्रालय का अधीनस्थ निकाय- कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) चावल निर्यात संवर्धन का भी नियामक प्राधिकरण है। दूतावास से जानकारी मिलने का बाद एपीडा ने उन तीनों प्रभावित कंपनियों को उसकी सूचना भेज दी है।&nbsp;</span></p><p>जानकार सूत्रों का कहना है कि अगर चीन इन तीनों भारतीय कंपनियों के लाइसेंस का निलंबन जारी रखता है तो भारत सरकार भी जवाबी कार्रवाई के लिए कदम उठा सकती है। सरकार का मानना है कि चीन ने जिस आधार पर लाइसेंस निरस्त करने का निर्णय लिया है वह कानूनी तौर पर वैध नहीं है। दुनिया जानती है कि भारत में जीएम धान-चावल का उत्पादन या आयात नहीं होता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31505</guid>				
                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:50:38 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कनाडा में लाल मसूर का भाव हरी मसूर से ऊपर पहुंचा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">सस्काटून। आमतौर पर कनाडा में लाल मसूर की तुलना में हरी मसूर का भाव काफी ऊंचा रहता है लेकिन इस वर्ष विपरीत स्थिति देखी जा रही है। मध्य अप्रैल में लाल मसूर का दाम हरी मसूर से 1-2 सेंट प्रति पौंड ऊपर चल रहा था। वर्ष 2014 के बाद पहली बार ऐसा हुआ। उस समय फरवरी-अगस्त के 27 सप्ताहों तक लाल मसूर का मूल्य हरी मसूर से कुछ ऊंचा रहा था।&nbsp;</span></p><p>व्यापार विश्लेषकों के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हरी मसूर के मुकाबले लाल मसूर की मांग ज्यादा है। यदि कीमतों का मौजूदा स्तर आगे भी बरकरार रहा तो किसानों की बिजाई धारणा में बदलाव हो सकता है। </p><p>कनाडा में मसूर की बिजाई लगभग आरंभ हो गई है। वर्ष 2025 के दौरान वहां बिजाई क्षेत्र में अच्छी बढ़ोत्तरी होने तथा उपज दर ऊंची रहने से हरी मसूर का शानदार उत्पादन हुआ था लेकिन उसके अनुरूप घरेलू एवं निर्यात मांग में बढ़ोत्तरी नहीं हो सकी।</p><p> सरकारी एजेंसी- स्टैट्स कैन के अनुसार कनाडा में मोटी हरी मसूर का उत्पादन 2024-25 सीजन के 4,50,277 लाख टन से उछलकर 2025-26 के सीजन में 10.10 लाख टन के शीर्ष स्तर पर पहुंच गया। इसी तरह छोटी हरी मसूर का उत्पादन भी 2,24,656 टन की तुलना में दोगुना से ज्यादा बढ़कर 5,18,424 टन की उंचाई पर पहुंच गया।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31503</guid>				
                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 16:40:23 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[तेलंगाना में मक्का का भाव एमएसपी से नीचे आने से किसान चिंतित]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">हैदराबाद। दक्षिण भारत में मक्का के एक महत्वपूर्ण उत्पादक राज्य- तेलंगाना में इस प्रमुख मोटे अनाज का भाव घटकर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे आने से किसान चिंतित तथा परेशान हैं और राज्य सरकार से इसकी खरीद शुरू करने की मांग कर रहे हैं। तेलंगाना सरकार ने केन्द्र से 15 लाख टन मक्का की खरीद करने के लिए 4000 करोड़ रुपए की राशि मंजूर करने का आग्रह किया है।&nbsp;</span></p><p>किसान संगठनों के अनुसार केन्द्र सरकार ने 2025-26 सीजन के लिए मक्का का एमएसपी 2400 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है जबकि थोक मंडी भाव इससे 30-35 प्रतिशत नीचे चल रहा है।&nbsp;</p><p>व्यापार विश्लेषकों के मुताबिक अमरीका एवं ब्राजील जैसे शीर्ष निर्यातक देशों में शानदार उत्पादन होने के कारण वैश्विक बाजार में मक्का की आपूर्ति एवं उपलब्धता काफी बढ़ गई है और कीमतों पर दबाव पड़ रहा है। इससे घरेलू बाजार में भी मक्का का दाम गिर गया है। तेलंगाना की अधिकांश मंडियों में भाव घटकर 1600-1800 रुपए प्रति क्विंटल रह गया है जिससे उत्पादकों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।</p><p>तेलंगाना में मक्का के एक प्रमुख उत्पादक क्षेत्र- खम्माम में नाराज किसानों द्वारा धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया जा रहा है। इसकी मांग है कि सरकार तुरंत क्रय केन्द्र स्थापित करके एमएसपी पर मक्का की खरीद शुरू करे। राज्य में प्रचलित नियम के अनुसार किसानों से प्रति एकड़ 26 क्विंटल मक्का खरीदा जाएगा। किसान इस नियम को भी हटाने की मांग कर रहे हैं। राज्य सरकार ने केन्द्र से मक्का खरीद में सहायता देने का आग्रह किया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31493</guid>				
                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 12:42:23 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीनी का उत्पादन घरेलू खपत से कम होने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। गन्ना की आपूर्ति एवं उपलब्धता, क्रशिंग की गति एवं मिलों के बंद होने की रफ्तार को देखते हुए स्पष्ट आभास होता है कि पिछले साल की भांति चालू मार्केटिंग सीजन में भी चीनी का उत्पादन घरेलू मांग एवं खपत से कम होगा। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">दोनों शीर्ष उद्योग संगठनों- इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन (इस्मा) तथा नेशनल फेडरेशन ऑफ को ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (एनएफसीएसएफ) के आंकड़ों से पता चलता है कि इस वर्ष 15 अप्रैल तक देश में लगभग 275 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ जबकि आगामी समय में 3-4 लाख टन का और उत्पादन हो सकता है। कुल मिलाकर 2025-26 के सम्पूर्ण मार्केटिंग सीजन में चीनी का सकल उत्पादन 280 लाख टन से कम या इसके आसपास हो सकता है।&nbsp;</span></p><p>दूसरी ओर चीनी की घरेलू मांग एवं खपत नीचे में 285 लाख टन से लेकर ऊपर में 295 लाख टन के बीच होने की संभावना है। इस तरह चीनी की मांग एवं आपूर्ति के बीच 5 से 15 लाख टन तक का अंतर रह सकता है </p><p>जिससे इसके अंतिम बकाया अधिशेष स्टॉक पर दबाव पड़ेगा। चिंता की बात यह है कि 2026-27 के मार्केटिंग सीजन में भी चीनी का उत्पादन घटने की आशंका है क्योंकि अल नीनो मौसम चक्र के प्रभाव से मानसूनी वर्षा कम होने पर गन्ना की पैदावार घट सकती है।</p><p>सरकार द्वारा 2025-26 के वर्तमान मार्केटिंग सीजन के लिए 15 लाख टन से अधिक चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई है जिसमें से 6 लाख टन से अधिक का निर्यात अनुबंध हो चुका है। </p><p>यदि सीजन के अंत तक 8-10 लाख टन का भी शिपमेंट हो जाता है तो मिलों के पास चीनी का कुल स्टॉक घटकर 2024-25 सीजन के स्तर से नीचे आ सकता है। 2025-26 के मौजूदा सीजन में बाजार की स्थिति कुछ हद तक सामान्य रह सकती है लेकिन 2026-27 के सीजन में जटिलता बढ़ने की संभावना है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31489</guid>				
                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:53:48 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[गेहूं की सरकारी खरीद शीघ्र ही जोर पकड़ने की उम्मीद]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। पिछले साल की तुलना में चालू वर्ष के दौरान मध्य अप्रैल तक गेहूं की सरकारी खरीद 48 प्रतिशत घटकर 36.60 लाख टन पर अटक गई क्योंकि फसल की कटाई-तैयारी में खराब मौसम के कारण देर हो गई क्योंकि फसल की कटाई-तैयारी में खराब मौसम के कारण देर हो गई और कई क्षेत्रों में इसकी क्वालिटी भी प्रभावित हुई। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">गेहूं के दाने में नमी का अंश बढ़ गया, उसकी चमक पीली पड़ गई और वह चिपटा भी हो गया। सरकार ने अब गुणवत्ता मानकों में रियायत देनी शुरू कर दी है। राजस्थान एवं हरियाणा में छूट दी जा चुकी है जबकि पंजाब में भी इसकी घोषणा होने वाली है।&nbsp;</span></p><p>हरियाणा को छोड़कर केन्द्रीय पूल में सर्वाधिक योगदान वाले चार अन्य राज्यों- पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीद की गति काफी धीमी चल रही है। </p><p>मध्य प्रदेश में स्थिति सबसे ज्यादा कमजोर है। लेकिन अब मौसम साफ होने लगा है और फसल की कटाई की गति तेज होती जा रही है जिससे आगामी समय में इसकी सरकारी खरीद की रफ्तार बढ़ने की प्रबल संभावना है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31481</guid>				
                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:11:43 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मसाला निर्यात में प्रतिस्पर्धा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">समग्र रूप से भारत दुनिया में मसालों का सबसे प्रमुख उत्पादक, उपभोक्ता एवं निर्यातक देश बना हुआ है। यहां से संसार&nbsp; के 100 से ज्यादा देशों को 80 से अधिक किस्मों के साबुत मसालों तथा मूल्य संवर्धित मसाला उत्पादों का निर्यात किया जाता है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">अनेक मसालों के निर्यात में भारत अग्रणी स्थान पर कायम है लेकिन कुछ अलग-अलग मसालों के वैश्विक निर्यात बाजार में इसे दूसरे आपूर्तिकर्त्ता देशों की सख्त चुनौती एवं कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इसके अलावा विभिन्न आयातक देशों द्वारा कीटनाशी अवयवों की उपस्थिति के बारे में बनाए जा रहे सख्त नियमों के कारण भी मसालों का निर्यात प्रभावित होने की आशंका है। गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरने के लिए भारतीय मसाला उत्पादकों एवं निर्यातकों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">नब्बे के दशक तक भारत संसार में कालीमिर्च का सबसे प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देश बना हुआ था मगर अब वियतनाम इससे काफी आगे निकल चुका है। काजू का मामला भी ऐसा ही है। इसी तरह जीरा के निर्यात बाजार में चीन की चुनौती बढ़ती जा रही है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">ध्यान देने की बात है कि चीन कुछ वर्ष पूर्व तक भारत से करीब 60-70 हजार टन जीरा का सालाना आयात करता था मगर अब वहां उत्पादन इतना बढ़ चुका है कि वह कुछ देशों को इसका निर्यात करने की स्थिति में पहुंच गया है। छोटी इलायची के मामले में भारत को ग्वाटेमाला की चुनौती झेलनी पड़ती है। लालमिर्च, हल्दी एवं धनिया के निर्यात बाजार में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।&nbsp;</span></p><p>अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के दौरान भारत से जीरा का निर्यात 15 प्रतिशत घटकर 1.67 लाख टन रह गया। भारत में&nbsp; जीरा की उत्पादकता दर 450-500 किलो प्रति हेक्टेयर है जबकि चीन में इससे डेढ़ गुणा ऊंची है। यद्यपि भारतीय मसालों के निर्यात का प्रदर्शन वर्तमान समय में संतोषजनक है मगर भविष्य के लिए सजग-सतर्क रहना अत्यन्त आवश्यक है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31478</guid>				
                <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 10:45:00 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[उत्तरी, मध्यवर्ती एवं पूर्वी राज्यों में जलसंकट बढ़ने की आशंका]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। देश के विभिन्न भागों में बांधों-जलाशयों एवं अन्य जल स्रोतों में पानी का स्तर जिस तेजी से घट रहा है उसे देखते हुए उत्तरी मध्यवर्ती एवं पूर्वी राज्यों में भी जलसंकट बढ़ने की आशंका है। दक्षिण भारत में पानी का अभाव महसूस होने लगा है। केवल पश्चिमी राज्यों की हालत कुछ बेहतर है। महाराष्ट्र में भीषण गर्मी का दौर जारी है।&nbsp;</span></p><p>कुल भंडारण क्षमता के सापेक्ष पानी का वास्तविक स्टॉक घटकर मध्यवर्ती भाग में 49.6 प्रतिशत, उत्तरी क्षेत्र में 44 प्रतिशत तथा पूर्वी राज्यों में 39 प्रतिशत रह गया है। </p><p>प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों की बात की जाए तो बांधों-जलाशयों में पानी का स्तर मध्य प्रदेश में 50.8 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 63 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 45.5 प्रतिशत, पंजाब में 68 प्रतिशत , राजस्थान में 50 प्रतिशत, बंगाल में 15 एवं आसाम में 17 प्रतिशत, उड़ीसा में 40 प्रतिशत, बिहार में 35 प्रतिशत और झारखंड में 57 प्रतिशत पर आ गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31466</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 19:09:17 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[Basmati Exporters Urge Government to Defer Levy]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/basmati-exporters-urge-government-to-defer-levy]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">New Delhi: Basmati rice exporters have urged the Central Government and APEDA to temporarily defer or withdraw the special GST levy of ₹70 per tonne imposed on contract registrations. It is noteworthy that this levy is collected from exporters for the benefit of the Basmati Export Development Foundation.</span></p><p>Exporters state that due to delayed payments, a sharp surge in shipping costs, and a drastic decline in profit margins, the financial position of small and medium-scale exporters has become extremely precarious; consequently, they are currently in no position to pay this levy. </p><p>Exporters are concerned that this additional financial burden, in the form of a levy, could severely undermine their competitiveness in the global export market and potentially drive their profit margins into negative territory.</p><p>Since the onset of tensions between Iran and the United States, Indian Basmati rice exporters have been navigating an extremely difficult phase and are in dire need of government support, assistance, and incentives.</p><p> According to industry analysts, exporters are already grappling with various problems, hurdles, and challenges, while the annual fee for contract registration adds to their financial strain.</p><p>It is pertinent to note that the country now exports over 6 million tonnes of Basmati rice annually; based on the levy of ₹70 per tonne, APEDA—or the Foundation—collects revenue exceeding ₹42 crore, exclusive of GST. This constitutes an unbearable financial burden for the exporters. </p><p>The government should immediately withdraw this levy to provide some much-needed relief to the exporters. Over 70 percent of India's annual Basmati rice exports are destined for countries across the Middle East, West Asia, and the Gulf region.</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31465</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 19:07:56 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[बासमती निर्यातकों द्वारा सरकार से लेवी को स्थगित करने का आग्रह]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। बासमती चावल के निर्यातकों ने केन्द्र सरकार एवं एपीडा से अनुबंध पंजीकरण पर लगाई जाने वाली 70 रुपए प्रति टन खास जीएसटी की लेवी को फिलहाल स्थगित रखने या वापस लेने का आग्रह किया है। उल्लेखनीय है कि बासमती एक्सपोर्ट डवलपमेंट फाउंडेशन के लिए निर्यातकों से यह लेवी वसूली जाती है।&nbsp;</span></p><p>निर्यातकों का कहना है की भुगतान में विलम्ब होने, शिपिंग खर्च में जोरदार बढ़ोत्तरी होने तथा मार्जिन (लाभ) में भारी कमी आने से छोटे एवं मध्यम श्रेणी के निर्यातकों की वित्तीय स्थिति बहुत कमजोर हो गई है और वे इस लेवी का भुगतान करने की हालत में नहीं हैं। निर्यातक इस बात से चिंतित हैं कि लेवी के रूप में यह अतिरिक्त वित्तीय भार वैश्विक निर्यात बाजार में उसकी प्रतिस्पर्धी क्षमता को बेहद कमजोर कर सकता है और उसका मार्जिन ऋणात्मक हो जाएगा।</p><p>ईरान और अमरीका के बीच शुद्ध शुरू होने के बाद से ही भारतीय बासमती चावल निर्यातक बेहद कठिन दौर से गुजर रहे हैं और उन्हें सरकारी सहयोग-समर्थन एवं प्रोत्साहन की सख्त आवश्यकता है। उद्योग समीक्षकों के अनुसार निर्यातकों को विभिन्न समस्याओं बाधाओं एवं चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जबकि अनुबंध पंजीकरण का वार्षिक शुल्क बहुत ऊंचा हो जाता है।&nbsp;</p><p>उल्लेखनीय है कि देश से प्रति वर्ष 60 लाख टन से अधिक बासमती चावल का निर्यात होने लगा है और इस पर लगी 70 रुपए प्रति टन की लेवी के रूप में एपीडा / फाउंडेशन द्वारा 42 करोड़ रुपए से अधिक का राजस्व वसूला जाता है जबकि जीएसटी इसमें शामिल नहीं है। </p><p>निर्यातकों पर यह असहनीय बोझ बन जाता है। सरकार को तुरंत इसे वापस लेना चाहिए ताकि निर्यातकों को कुछ राहत मिल सके। मध्य-पूर्व, पश्चिम एशिया एवं खाड़ी क्षेत्र के देशों में भारत से 70 प्रतिशत से अधिक बासमती चावल का सालाना निर्यात होता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31464</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 19:05:10 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीनी का घरेलू उत्पादन 280 लाख टन के करीब होने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-280-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। चालू मार्केटिंग सीजन में अब केवल 19 इकाइयों के क्रियाशील रहने से चीनी का कुल घरेलू उत्पादन 280 लाख टन के आसपास सिमट जाने का अनुमान है। 15 अप्रैल तक लगभग 275 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश की कुछ इकाइयों में गन्ना की क्रशिंग हो रही है। लेकिन उसके भी जल्दी ही बंद होने की संभावना है।&nbsp;</span></p><p>शीर्ष उद्योग संस्था- इंडियन शुगर एंड बायो- एनर्जी मैन्युफैक्चर्स एसोसिएशन (इस्मा) के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि चालू मार्केटिंग सीजन में 1 अक्टूबर 2025 से 15 अप्रैल 2026 तक देश में कुल 274.80 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ जो 2024-25 सीजन की समान अवधि के उत्पादन 255 लाख टन से करीब 20 लाख टन ज्यादा है। </p><p>चीनी का उत्पादन 8 प्रतिशत जरूर बढ़ा है मगर यह सीजन के आरंभ में लगाए गए अनुमान से काफी कम है। इस्मा के मुताबिक पिछले साल 15 अप्रैल को 38 चीनी मिलों में गन्ना की क्रशिंग जारी थी जबकि चालू वर्ष में इसकी संख्या घटकर आधी रह गई।</p><p>इस्मा की रिपोर्ट के अनुसार जून-जुलाई के दौरान कर्नाटक एवं तमिलनाडु की कुछ इकाइयों में गन्ना क्रशिंग का विशेष सत्र चलेगा और वहां करीब 3 लाख टन तक चीनी का अतिरिक्त उत्पादन हो जाएगा। </p><p>इस तरह कुल सीजनल उत्पादन 280 लाख टन के करीब पहुंच सकता है। इस्मा ने पहले 309.50 लाख टन चीनी के उत्पादन का अनुमान लगाया था।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31462</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:00:51 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[केन्द्रीय पूल में खाद्यान्न का स्टॉक गत वर्ष से काफी ज्यादा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के आंकड़ों से ज्ञात होता है कि 1 अप्रैल 2026 को केन्द्रीय पूल में 386 लाख टन चावल एवं 218 लाख टन गेहूं के साथ कुल 604 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक मौजूद था जो 1 अप्रैल 2025 को उपलब्ध स्टॉक 500 लाख टन से काफी ज्यादा है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">गत वर्ष की समान अवधि में केन्द्रीय पूल में 382 लाख टन चावल तथा 118 लाख टन गेहूं का स्टॉक मौजूद था। 1 अप्रैल 2026 से गेहूं की सरकारी खरीद का नया मार्केटिंग सीजन औपचारिक तौर पर आरंभ हो गया।&nbsp;</span></p><p>केन्द्रीय खाद्य मंत्रालय ने चालू रबी मार्केटिंग सीजन के दौरान 303.37 लाख टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा है। हालांकि कुछ खास कारणों से फिलहाल खरीद की गति धीमी चल रही है लेकिन आगामी समय में इसकी रफ्तार बढ़ने की उम्मीद है। </p><p>प्रमुख उत्पादक राज्यों में फसल की कटाई तेजी से हो रही है जबकि प्राकृतिक आपदाओं और खासकर बेमौसमी वर्षा के प्रकोप का खतरा अब भी बरकरार है। कुछ राज्यों में रबी कालीन धान की खरीद का सीजन भी आरंभ हो गया है।</p><p>केन्द्रीय पूल में गेहूं का मौजूदा स्टॉक न्यूनतम आवश्यक बफर मात्रा से काफी अधिक है। अप्रैल-जून की तिमाही के लिए केन्द्रीय पूल में कम से कम 75 लाख टन गेहूं का स्टॉक अवश्य रहना चाहिए। </p><p>इसमें 44.60 लाख टन का संचालनीय स्टॉक तथा 30 लाख टन का रिजर्व (रणनीतिक आरक्षित) स्टॉक शामिल है। इसके मुकाबले 1 अप्रैल को केन्द्रीय पूल में 218 लाख टन गेहूं का स्टॉक उपलब्ध था जबकि आगे यह स्टॉक जून तक निरन्तर बढ़ने की संभावना है। इसी तरह चावल का भी पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और इसकी मात्रा भी आगे बढ़ती रहेगी।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31460</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 17:57:54 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[व्यापार समझौता पर वार्ता के लिए भारतीय दल जाएगा अमरीका]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्रीय वाणिज्य सचिव ने कहा है कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते के मसौदे को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से आगे की बातचीत के लिए भारतीय अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल 20-22 अप्रैल को अमरीका का दौरा करेगा। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">भारत का इरादा अमरीका के साथ व्यापार संधि को यथाशीघ्र अंतिम रूप देना है। अगले सप्ताह इस व्यापार समझौता को वैधानिक स्वरूप देने का हर संभव प्रयास किया जाएगा।&nbsp;</span></p><p>उल्लेखनीय है कि दोनों देशों द्वारा फरवरी 2026 में अंतरिम व्यापार समझौता पर एक संयुक्त बयान जारी किया गया था और उसके बाद दोनों देशों के बीच यह पहली आधिकारिक मिटिंग होगी जिसमें संधि की संरचना पर विस्तृत विचार-विमर्श किए जाने की संभावना है। </p><p>जब अंतरिम व्यापार समझौते की घोषणा हुई थी तब अमरीका ने भारतीय उत्पादों पर लगे 25 प्रतिशत के सामान्य सीमा शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत नियत किया था और 25 प्रतिशत के अतिरिक्त आयात शुल्क को पूरी तरह वापस ले लिया था।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31458</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:56:08 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मध्य अप्रैल तक 36.60 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-36-60-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि इस वर्ष मध्य अप्रैल तक भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) एवं उसकी सहयोगी प्रांतीय एजेंसियों द्वारा केन्द्रीय पूल के लिए करीब 36.60 लाख टन गेहूं खरीदा गया जो पिछले साल की समान अवधि की खरीद से 48 प्रतिशत कम रहा।&nbsp;</span></p><p>प्रमुख उत्पादक राज्यों में फसल की कटाई-तैयारी एवं मंडियों में आवक में देर होने तथा क्वालिटी की समस्या बरकरार रहने से गेहूं की सरकारी खरीद की गति धीमी चल रही है। खरीद की रफ्तार बढ़ाने के उद्देश्य से सरकार ने राजस्थान एवं हरियाणा में गेहूं के गुणवत्ता मानकों में रियायत प्रदान कर दी है और पंजाब में भी शीघ्र ही राहत की घोषणा किए जाने की उम्मीद है। </p><p>इसके तहत गेहूं के लॉट में चिपटे एवं हरे दाने के स्वीकृत या मान्य अंश को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत नियत किया गया है। इसी तरह 50 प्रतिशत तक चमकहीन दाने वाले गेहूं की सरकारी खरीद की मंजूरी दी गई है। </p><p>जानकारों का कहना है कि ऐसे गेहूं में पौष्टिक तत्वों की तो कमी नहीं होती है लेकिन उसकी जीवनावधि छोटी होती है और इसलिए उसे ज्यादा समय तक गोदाम में नहीं रखा जा सकता। इससे उसके खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।&nbsp;</p><p>सरकारी आंकड़ों के अनुसार चालू रबी मार्केटिंग सीजन में मध्य अप्रैल तक राष्ट्रीय स्तर पर करीब 63.70 लाख टन गेहूं की आवक हुई जिसमें से 36.60 लाख टन या 57 प्रतिशत की खरीद केन्द्रीय पूल के लिए की गई। हालांकि पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान जैसे राज्यों में गेहूं की सरकारी खरीद जारी है लेकिन इसकी गति धीमी देखी जा रही है। </p><p>मध्य प्रदेश में केवल 1,99,131 टन गेहूं खरीदा गया जो गत वर्ष से 95 प्रतिशत पीछे है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में 57 प्रतिशत तथा राजस्थान में 49 प्रतिशत कम गेहूं खरीदा गया है। पंजाब में खरीद 6 प्रतिशत गिरकर 2,46,161 टन रह गई लेकिन हरियाणा में यह 22 प्रतिशत की जोरदार वृद्धि के साथ 28.70 लाख टन पर पहुंच गई।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31456</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:53:01 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[बारिश की कमी एवं बढ़ती गर्मी से सूखने लगे-जलाशय]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। लम्बे समय से देश के अधिकांश भागों में अच्छी वर्षा नहीं होने तथा तापमान में नियमित रूप से बढ़ोत्तरी जारी रहने के कारण प्रमुख बांधों-जलाशयों में पानी का स्तर तेजी से घटता जा रहा है और उसके सूखने का खतरा पैदा हो गया है। छोटे-छोटे नदी-नाले एवं कुआं-तालाब भी सूखने की ओर बढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि भूजल एवं भूमिगत पानी का स्तर भी लगातर घटता जा रहा है।&nbsp;</span></p><p>केन्द्रीय जल आयोग के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि केवल पश्चिमी संभाग के बांधों-जलाशयों में कुल मिलाकर भंडारण क्षमता के 50 प्रतिशत से अधिक पानी का स्टॉक मौजूद है जबकि शेष क्षेत्रों में यह घटकर आधा से भी कम रह गया है। यदि शीघ्र ही मानसून पूर्व की अच्छी बारिश नहीं हुई तो बांधों में जलस्तर घटकर और भी नीचे जा सकता है।&nbsp;</p><p>देश के पश्चिमी संभाग के 53 प्रमुख बांधों-जलाशयों में फिलहाल 19.552 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) पानी का स्टॉक बचा हुआ है जो उसकी कुल भंडारण क्षमता 38.094 बीसीएम का 51.33 प्रतिशत है। वहां गुजरात के जलाशयों में 56 प्रतिशत, महाराष्ट्र के बांधों में 47 प्रतिशत तथा गोवा के एक मात्र जलाशय में 45 प्रतिशत पानी का स्टॉक बचा हुआ है। छ माह पूर्व यह पूरी तरह भरा हुआ था।&nbsp;</p><p>दक्षिण भारत की हालत नाजुक है। वहां 47 बांधों में पानी का स्टॉक घटकर मात्र 17.457 बीसीएम रह गया जो कुल भंडारण क्षमता 55.288 बीसीएम का 31.5 प्रतिशत है। गत वर्ष इस समय उन जलाशयों में 34 प्रतिशत पानी का भंडार बचा हुआ था। कर्नाटक एवं तेलंगाना के बांधों में जलस्तर घटकर 30 प्रतिशत से भी नीचे आ गया है जबकि केरल के जलाशय में 33 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 40 प्रतिशत एवं तमिलनाडु के जलाशय में 41 प्रतिशत पानी का स्टॉक रह गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31454</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:48:04 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[गन्ना की कमी से अधिकांश चीनी मिलें बंद]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। गन्ना की क्रशिंग एवं चीनी के उत्पादन का सीजन इस बार नियत समय से पहले ही समाप्त हो जाने की संभावना है क्योंकि प्लांटों को गन्ना की समुचित आपूर्ति नहीं हो रही है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इस बार 15 अप्रैल तक देश में केवल 21 चीनी मिलें चालू थीं जबकि 520 इकाइयां बंद हो चुकी थीं। इसके मुकाबले पिछले साल की इसी अवधि को 35 इकाइयों में गन्ना की क्रशिंग हो रही थी और 499 मिलें बंद हो गई थीं।&nbsp;</span></p><p>केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने 2025-26 के वर्तमान मार्केटिंग सीजन (अक्टूबर-सितम्बर) में गन्ना की पैदावार बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान लगाया है। यदि सरकारी आंकड़ों पर विश्वास किया जाए तो सवाल उठता है कि गन्ना का विशाल स्टॉक आखिर कहां गया ? </p><p>चीनी के उत्पादन में पहले 18-20 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था जबकि वास्तविक बढ़ोत्तरी महज 8 प्रतिशत की हुई। एथनॉल के निर्माण के लिए भी गन्ना का उपयोग सीमित कर दिया गया और अब चालू माह (अप्रैल 2026) के अंत तक सभी चीनी मिलों के बंद हो जाने की संभावना है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31452</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:45:18 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[खाद्य तेलों के आधार आयात मूल्य में बढ़ोत्तरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। घरेलू प्रभाग में तेजी-मजबूती का माहौल बरकरार रहने के बावजूद केन्द्र सरकार ने पाम तेल एवं सोयाबीन तेल के आधार आयात मूल्य (टैरिफ वैल्यू) में क्रमश: 32-33 डॉलर एवं 28 डॉलर प्रति टन का इजाफा कर दिया। नया आधार आयात मूल्य 16 से 30 अप्रैल तक प्रभावी रहेगा।</span></p><p>केन्द्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार 16-30 अप्रैल 2026 के लिए क्रूड पाम तेल (सीपीओ) का आधार आयात मूल्य 1174 डॉलर प्रति टन, आरबीडी पामोलीन का 1202 डॉलर प्रति टन तथा क्रूड डिगम्ड&nbsp; सोयाबीन तेल का 1252 डॉलर प्रति टन निर्धारित किया गया है। वैश्विक बाजार में प्रचलित ऊंचे भाव के कारण इसकी टैरिफ वैल्यू बढ़ाई गई है।</p><p>ध्यान देने की बात है कि सरकार प्रत्येक पंद्रह दिनों पर नया आयात आधार मूल्य निर्धारित करती है और इस पर ही सीमा शुल्क की वसूली की जाती है। </p><p>क्रूड श्रेणी के खाद्य तेलों पर 16.50 प्रतिशत तथा रिफाइंड खाद्य तेलों पर 35.75 प्रतिशत का आयात शुल्क लगा हुआ है। भारत में रिफाइंड खाद्य तेलों के संवर्ग में मुख्यतः आरबीडी पामोलीन का आयात होता है। सूरजमुखी तेल के लिए टैरिफ वैल्यू का निर्धारण नहीं होता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31450</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 13:54:08 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[पिछले वित्त वर्ष में अधिकांश दलहनों का आयात घटा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। एग्री कॉमोडिटी मार्केट की एक अग्रणी रिसर्च फर्म- आईग्रेन इंडिया के सीएमडी राहुल चौहान का कहना है कि 2024-25 वित्त वर्ष की तुलना में 2025-26 के दौरान कुछ हद तक तुवर (अरहर) एवं उड़द को छोड़कर शेष लगभग सभी प्रमुख दलहनों के आयात में गिरावट आई क्योंकि देश में इसका अच्छा खासा पिछला बकाया स्टॉक उपलब्ध था। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">ऑस्ट्रेलिया ने 2024-25 में भारत को रिकॉर्ड मात्रा में चना का निर्यात किया था और 2025-26 के सीजन में वहां उत्पादन भी उत्साहवर्धक हुआ। लेकिन वहां उत्पादक 575 डॉलर प्रति टन से नीचे दाम पर अपना चना बेचने के इच्छुक नहीं है इसलिए वहां से इसका आयात घट गया है।&nbsp;</span></p><p>इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन के अनुसार 2024-25 की तुलना में 2025-26 के दौरान पीली मटर का वैश्विक बाजार भाव 380-400 डॉलर प्रति टन से घटकर 320-330 डॉलर प्रति टन रह गया जबकि भारत सरकार ने इस पर नवम्बर 2025 में 30 प्रतिशत का सीमा शुल्क लगा दिया था। </p><p>इसी तरह तुवर का वैश्विक बाजार मूल्य 2024-25 के 1000-1100 डॉलर प्रति टन से गिरकर 2025-26 में 700-850 डॉलर प्रति टन पर आ गया। चना का मामला भी कुछ इसी तरह का रहा। इसका भाव 2024-25 के 650 डॉलर प्रति टन से घटकर पहले 470-480 डॉलर प्रति टन पर आया लेकिन बाद में सुधरकर 510-520 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया। </p><p>चना के आयात में करीब 50 प्रतिशत की भारी गिरावट आ गई। पीली मटर का आयात भी घटकर आधा रह गया। मसूर के आयात की गति धीमी रही। तुवर और उड़द के आयात में सीमित बढ़ोत्तरी देखी गई। इससे दलहनों का कुल आयात काफी घट गया।&nbsp;</p><p>केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार दलहनों का कुल घरेलू उत्पादन 2024-25 सीजन के 256.83 लाख टन से घटकर 2025-26 के सीजन में 238.69 लाख टन रह जाने की संभावना है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31448</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 13:02:39 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चालू माह में यूरिया का घरेलू उत्पादन 20 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-20-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। यूरिया का घरेलू उत्पादन मार्च के 18 लाख टन से 11 प्रतिशत बढ़कर अप्रैल में 20 लाख टन के करीब पहुंच जाने की उम्मीद है। पश्चिम संकट के कारण एलएनजी की आपूर्ति पर असर पड़ा था मगर अब इसकी उपलब्धता में सुधार आ गया है। आमतौर पर अप्रैल में करीब 21.80 लाख टन यूरिया का औसत उत्पादन होता रहा है।&nbsp;</span></p><p>चालू माह के दौरान विदेशों से भी करीब 6 लाख टन यूरिया का आयात होने की संभावना है जिससे इसकी उपलब्धता 26 लाख टन के आसपास पहुंच जाएगी। मई में घरेलू उत्पादन में और भी इजाफा हो सकता है। </p><p>जून से खरीफ फसलों की बिजाई शुरू होती है और तब यूरिया की घरेलू मांग शीर्ष स्तर पर पहुंच जाती है। इसे पूरा करने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों में इस महत्वपूर्ण रासायनिक उर्वरक का स्टॉक पहुंचाया जा रहा है ताकि किसानों को सही समय पर यह हासिल हो सके।&nbsp;</p><p>भारत में प्रतिमाह औसतन 20-25 लाख टन यूरिया का उत्पादन होता है जो मार्च 2026 में करीब 27 प्रतिशत घटकर 18 लाख टन पर आ गया। उत्पादक इकाइयों को गैस की पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो सकी। 6 अप्रैल से इसकी आपूर्ति बढ़ने लगी और अब प्लांटों की 90 प्रतिशत जरूरत के लायक गैस की आपूर्ति होने लगी है। इससे यूरिया के उत्पादन में सुधार आने लगा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31446</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:31:33 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[दलहनों के आयात खर्च में 35 प्रतिशत की कमी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-35-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। वैश्विक बाजार भाव अपेक्षाकृत नरम रहने तथा कम मात्रा में माल मंगाए जाने से वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान दलहनों के आयात की मात्रा एवं इस पर खर्च होने वाली राशि में भारी गिरावट दर्ज की गई।&nbsp;</span></p><p>उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दलहनों के आयात पर होने वाला खर्च वित्त वर्ष 2024-25 के रिकॉर्ड स्तर 5.44 अरब डॉलर से 35 प्रतिशत घटकर वित्त वर्ष 2025-26 (अप्रैल-मार्च) में 3.57 अरब डॉलर रह गया। </p><p>भारतीय मुद्रा में भी यह आयात खर्च समीक्षाधीन अवधि के दौरान 46.427 करोड़ रुपए से 31.52 प्रतिशत घटकर 31,793 करोड़ रुपए पर अटक गया।&nbsp;</p><p>व्यापार विश्लेषकों के मुताबिक 2024-25 के वित्त वर्ष में देश के अंदर दलहनों का कुल आयात तेजी से उछलकर 73.20 लाख टन के सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन 2025-26 के वित्त वर्ष में यह घटकर 56-57 लाख टन के करीब रह गया।&nbsp;</p><p>एक अग्रणी व्यापारिक संस्था- इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन के सचिव के अनुसार पिछला बकाया स्टॉक मौजूद रहने तथा घरेलू उत्पादन लगभग सामान्य होने के कारण देश में दलहनों का कम आयात हुआ। </p><p>दूसरी ओर प्रमुख&nbsp; आपूर्तिकर्ता देशों में विभिन्न दलहनों का भाव नीचे रहने से आयात खर्च काफी घट गया। 2024-25 की तुलना में 2025-26 के दौरान चना, पीली मटर, मसूर, तुवर एवं उड़द सहित अन्य प्रमुख दलहनों के वैश्विक बाजार मूल्य में औसतन 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके बावजूद आयात में इजाफा नहीं हुआ।&nbsp;</p><p>समीक्षाधीन अवधि के दौरान पीली मटर का भाव 380-400 डॉलर प्रति टन से घटकर 320-330 डॉलर प्रति टन रह गया।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31444</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 11:46:54 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[बांधों-जलाशयों में पानी का स्टॉक घटना जारी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्रीय जल आयोग के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि देश भर के 166 प्रमुख बांधों- जलाशयों में पानी का स्टॉक घटकर 78.481 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) पर आ गया है जो उसकी कुल भंडारण क्षमता 18.565 बीसीएम का 42.5 प्रतिशत है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">देश के पांच संभागों में से चार क्षेत्रों में जल स्तर 50 प्रतिशत से नीचे है। आयोग के अनुसार वैसे मौजूदा जल स्तर गत वर्ष की तुलना में 16 प्रतिशत तथा दस वर्षीय औसत के मुकाबले 27 प्रतिशत बिंदु ऊपर है।&nbsp;</span></p><p>भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 1 मार्च से 16 अप्रैल 2026 के दौरान देश के 725 जिलों में से 30 प्रतिशत जिलों में बारिश नहीं या नगण्य हुई। इससे पूर्व जनवरी-फरवरी 2026 में देश के 70 प्रतिशत से अधिक भाग में शीतकालीन वर्षा का अभाव रहा था। </p><p>मध्य मार्च से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक देश के कुछ भागों में थोड़ी-बहुत वर्षा हुई लेकिन इससे बांधों-जलाशयों में पानी का स्टॉक नहीं बढ़ सका। जून से खरीफ कालीन फसलों की बिजाई शुरू होने वाली है और इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून भी कमजोर रहने की संभावना है। ऐसी हालत में बांधों-जलाशयों में पानी का घटता स्तर जटिल समस्या पैदा कर सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/31442</guid>				
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 11:12:18 +0530</pubDate>
            </item>
                
    </channel>

</rss>