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        <title><![CDATA[ Igrain India ]]></title>
        <link><![CDATA[ https://igrain.in/feeds ]]></link>
        <description><![CDATA[ Igrain India ]]></description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Fri, 02 Oct 2026 00:00:35 +0530</pubDate>
  
                    <item>
                <title><![CDATA[दिसम्बर तक सीपीओ का वायदा मूल्य 4500-5000 रिंगिट के बीच रहने की उम्मीद]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-4500-5000-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मुम्बई। गोदरेज इंटरनेशनल के डायरेक्टर दोराब मिस्त्री ने कहा है कि कुआलालम्पुर स्थित बुर्सा मलेशिया डेरिवेटिव्स (बीएमडी) एक्सचेंज में क्रूड पाम तेल (सीपीओ) का बेंचमार्क वायदा मूल्य दिसम्बर 2026 तक 4500 से 5000 रिंगिट 1,05,556.19 से 1,17,284.65 रुपए) प्रति टन&nbsp; के बीच रह सकता है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">दौराब मिस्त्री के अनुसार 2025-26 की तुलना में 2026-27 के दौरान क्रूड पाम तेल के उत्पादन में 25 लाख टन की गिरावट आ सकती है क्योंकि अल नीनो के प्रकोप से खासकर इंडोनेशिया में सूखे का संकट बढ़ सकता है।&nbsp;</span></p><p>अगले वर्ष पाम तेल के वैश्विक बाजार में अनिश्चितता का माहौल रहने की संभावना है। दक्षिण-पूर्व एशिया में वर्षा कम होने पर पाम तेल का उत्पादन प्रभावित होने कि आशंका है। 2025-26 के सीजन में उत्पादन घटने की आशंका के बावजूद दौराब मिस्त्री ने पाम तेल उद्योग को आगाह किया है कि वह कीमतों में जोरदार तेजी की उम्मीद के साथ अपनी आगामी रणनीति बनाने से बचे। दरअसल भारत में पाम तेल का आयात स्थिर रहने, सूरजमुखी तेल का आयात बढ़ने और सोयाबीन तेल का आयात घटने का अनुमान लगाया जा रहा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38133</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 19:26:12 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[पहली तिमाही में मसालों का निर्यात 26 प्रतिशत घटा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-26-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">कोच्चि। मसाला बोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यानी अप्रैल-जून 2026 के दौरान देश से मसालों का कुल निर्यात घटकर 4,87,688 टन पर अटक गया जो पिछले साल की इसी अवधि के शिपमेंट 6,54,936 टन से करीब 26 प्रतिशत कम रहा। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">लेकिन दूसरी ओर इसकी निर्यात आय 4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 138.19 अरब रुपए पर पहुंच गई। निर्यात आमदनी में हुई वृद्धि का कारण मसालों का निर्यात ऑफर मूल्य ऊंचा होना तथा रुपया की विनिमय दर का नीचे रहना है।&nbsp;</span></p><p>समीक्षाधीन अवधि के दौरान जिन मसालों के निर्यात में भारी गिरावट आई उसमें जायफल-जावित्री, जीरा, धनिया, लहसुन एवं मेथी आदि शामिल है। दूसरी ओर इसी अवधि में हल्दी, इमली तथा मिंट उत्पादों के निर्यात में कुछ बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।&nbsp;</p><p>उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 के मुकाबले 2026 में अप्रैल-जून के दौरान जायफल- जावित्री का निर्यात 1486 टन से घटकर 1036 टन, जीरा का शिपमेंट 78,278 टन से घटकर 58,821 टन, धनिया का निर्यात 23,447 टन से लुढ़ककर 18,678 टन, लहसुन का शिपमेंट 16,260 टन से गिरकर 13,228 टन और मेथी का निर्यात 16,943 टन से उछलकर 12,841 टन पर सिमट गया। </p><p>दूसरी ओर इसी अवधि में हल्दी का निर्यात 63,020 टन से सुधरकर 65,476 टन, इमली का निर्यात 15,897 टन से सुधरकर 16,242 टन तथा मिंट उत्पादों का निर्यात&nbsp; 7757 टन से बढ़कर 8477 टन पर पहुंच गया।&nbsp;</p><p>इसके अलावा भारत से लालमिर्च, कालीमिर्च, छोटी बढ़ी इलायची एवं सौंफ सहित कई अन्य मसालों एवं मूल्य संवर्धित मसाला उत्पादों का भी निर्यात हुआ जिससे अच्छी आमदनी प्राप्त हुई। उल्लेखनीय है कि मसालों के संवर्ग में निर्यात की मात्रा एवं आमदनी की दृष्टि से लालमिर्च प्रथम स्थान पर रहता है। भारत मसालों का सबसे प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देश है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38131</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 19:22:24 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[सीमा शुल्क में कटौती से सूरजमुखी तेल का आयात बढ़ने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मुम्बई। केन्द्र सरकार ने क्रूड सूरजमुखी तेल पर मौलिक आयात शुल्क को 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य प्रतिशत तथा रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर 32.5 प्रतिशत से घटाकर 22.5 प्रतिशत निर्धारित कर दिया है। भारत में मुख्यत: क्रूड सूरजमुखी तेल का ही आयात किया जाता है जबकि नेपाल से सूरजमुखी तेल का थोड़ा-बहुत आयात होता है जिस पर कोई शुल्क नहीं लगता है।</span></p><p>एक अग्रणी उद्योग संस्था- सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सी) के अनुसार शुल्क कटौती के कारण 2026-27 के मार्केटिंग सीजन (नवम्बर-अक्टूबर) में सूरजमुखी तेल का आयात करीब 30 प्रतिशत की भारी बढ़ोत्तरी के साथ 35 लाख टन पर पहुंच जाने की उम्मीद है लेकिन दूसरी ओर सोयाबीन तेल का आयात 10.7 प्रतिशत घटकर 50 लाख टन के आसपास रह जाने की संभवना है। सीमा शुल्क लगभग समाप्त हो जाने से क्रूड सूरजमुखी तेल का आयात सस्ता होगा और घरेलू बाजार मूल्य में नरमी आने से इसकी मांग एवं खपत में बढ़ोत्तरी होगी।&nbsp;</p><p>जहां तक पाम तेल का सवाल है तो इसका आयात लगभग सामान्य या स्थिर रहने की संभावना है। एसोसिएशन के मुताबिक 2026-27 के मार्केटिंग सीजन में देश के अंदर लगभग 80 लाख टन पाम तेल का आयात हो सकता है। खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में हुई कटौती का निर्णय 24 सितम्बर से प्रभावी हुआ है जबकि 31 अक्टूबर को मौजूदा मार्केटिंग सीजन समाप्त हो जाएगा इसलिए चालू सीजन में खाद्य तेलों के आयात पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगले मार्केटिंग सीजन में काफी अंतर दिखाई पड़ सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38129</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 18:01:44 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[तुवर का आयात 44 प्रतिशत बढ़कर 5.79 लाख टन पर पहुंचा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-44-5-79-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। चालू वर्ष के शुरूआती सात महीनों में यानी जनवरी-जुलाई 2026 के दौरान भारत में अरहर (तुवर) का आयात उछलकर 5.79 लाख टन पर पहुंच गया जो पिछले साल की समान अवधि के आयात 4.01 लाख टन से 44 प्रतिशत अधिक रहा। इस अवधि में अफ्रीकी देश- मोजाम्बिक से सर्वाधिक 2.18 लाख टन तुवर का आयात हुआ। इसके बाद म्यांमार से 1.35 लाख टन, तंजानिया से 1.04 लाख टन तथा सूडान से 68,499 टन तुवर का आयात किया गया। शेष आयात अन्य देशों से हुआ।&nbsp;</span></p><p>उल्लेखनीय है कि वर्ष 2024 की तुलना में 2025 के दौरान भारत में तुवर का कुल आयात 5.42 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 13.25 लाख टन पर पहुंचा था। अग्रणी व्यापारिक संस्था-&nbsp; इंडिया पल्सेस एन्ड ग्रेन्स एसोसिएशन (आईपीजीए) के अनुसार वर्ष 2025 की तुलना में 2026 के खरीफ सीजन में अरहर के बिजाई क्षेत्र में कुछ बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन दोनों शीर्ष उत्पादक राज्यों- कर्नाटक एवं महाराष्ट्र में भयंकर सूखे से फसल प्रभावित होने की आशंका है जिससे इसके उत्पादन के प्रति चिंता बढ़ती जा रही है। </p><p>हालांकि उद्योग- व्यापार क्षेत्र के विश्लेषक इस बार तुवर का उत्पादन घटने की संभावना व्यक्त कर रहे हैं लेकिन अभी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने का समय नहीं आया है। सितम्बर में बारिश हुई जिससे फसल को थोड़ी राहत मिली। अगले दो ढाई माह के बाद तुवर की नई फसल की कटाई-तैयारी आरंभ होगी इसलिए अभी लम्बा समय बाकी है।</p><p>राष्ट्रीय स्तर पर तुवर का बिजाई क्षेत्र गत वर्ष के 45.95 लाख हेक्टेयर से बढ़कर मौजूदा खरीफ सीजन में 47.25 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। इसका बिजाई क्षेत्र कर्नाटक में 15.33 लाख हेक्टेयर से 6 प्रतिशत गिरकर 14.16 लाख हेक्टेयर तथा महाराष्ट्र में क्षेत्रफल 12.21 लाख हेक्टेयर से 1.5 प्रतिशत गिरकर 12.02 लाख हेक्टेयर पर अटक गया। दूसरी ओर इसका उत्पादन क्षेत्र उत्तर प्रदेश में 2.97 लाख हेक्टेयर से 11 प्रतिशत बढ़कर 3.30 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड एवं छत्तीसगढ़ में भी रकबा कुछ बढ़ा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38127</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 17:32:48 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[तिलहन-खाद्य तेल की निर्बाध आपूर्ति के लिए नामपुला सरकार एवं &#039;सी&#039; में गठजोड़]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मुम्बई। भारतीय वनस्पति तेल उद्योग एवं व्यापार क्षेत्र की एक शीर्ष संस्था- सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सी) तथा मोजाम्बिक के नामपुला प्रान्त की सरकार और साथ ही साथ सोलिडरिडाड नेटवर्क्ड एशिया एवं सोलिडरिडाड सॉदर्न अफ्रीका के बीच पारम्परिक हित के एक स्टेटमेंट पर हस्ताक्षर हुए हैं जिसका उद्देश्य नामपुला और भारत के बीच तिलहन एवं वनस्पति तेल की आवागमन के लिए एक स्थायी कॉरिडोर का पता लगाना और उसका उपयोग करना है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इस प्रयास का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भारत के लिए तिलहनों एवं खाद्य तेलों के नए एवं जिम्मेदार स्रोतों का विकास करना है और साथ ही साथ स्थानीय प्रोसेसिंग गतिविधियों, किसानों की भागीदारी तथा मोजाम्बिक में निवेश के अवसरों को प्रोत्साहित करना भी है। मोजाम्बिक अफ्रीका महाद्वीप के पूर्वी भाग में अवस्थित एक देश है और नामपुला उसका एक प्रान्त है।</span></p><p>भारत दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे प्रमुख आयातक देश है जो अब इसके आयात के लिए अफ्रीका की ओर भी देख रहा है इसी संदर्भ में नामपुला प्रान्त तथा भारतीय उद्योग के बीच तिलहन कॉरिडोर पैक्ट हुआ है।&nbsp;</p><p>नामपुला के गवर्नर ने भारतीय प्रोसेसर्स को अपने यहां तिलहनों की क्रशिंग-प्रोसेसिंग एवं रिफाइनिंग क्षेत्र में निवेश के लिए आमंत्रित किया है ताकि एक तरफ भारत को खाद्य तेलों का निर्यात करने और दूसरी ओर नामपुल में रोजगार के नए अवसरों का निर्माण करने में सहायता मिल सके। </p><p>भारतीय प्रोसेसर्स / रिफाइनर्स खाद्य तेलों की आपूर्ति के लिए नए-नए स्रोतों की तलाश कर रहे हैं और इसी संदर्भ में अब मोजाम्बिक पर इसकी नजर पड़ी है। समझौते में इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि नामपुला में जंगलों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा और किसानों को राहत प्रदान की जाएगी।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38125</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 17:20:23 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीनी की स्टॉक सीमा का नया नियम 15 अक्टूबर से होगा लागू]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-15-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्रीय खाद्य, उपभोक्ता मामले एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय का कहना है कि जमाखोरी को रोकने के लिए चीनी की भंडारण सीमा के नियम में जो बदलाव किया गया उसका इसकी कीमतों पर सकारात्मक असर पड़ा। त्यौहारी सीजन के दौरान आम उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर चीनी की पर्याप्त एवं निर्बाध आपूर्ति तथा उपलब्धता सुनिश्चित करने में इससे मदद मिल रही है। शीर्ष स्तर के मुकाबले चीनी का एक्स फैक्टरी भाव करीब 28 प्रतिशत एवं खुदरा मूल्य 15 प्रतिशत घट गया है।&nbsp;</span></p><p>मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार सरकार ने डीलर्स के लिए चीनी भंडारण की मात्रा घटाकर 1000 क्विंटल तथा भंडारण की समयावधि को घटाकर 15 दिन निर्धारित करने का निर्णय लिया है जो 15 अक्टूबर से 30 नवम्बर 2026 तक प्रभावी रहेगा। केवल कोलकाता एवं इसके विस्तारित महानगरीय क्षेत्रों तथा आसाम में यह नियम लागू नहीं होगा। वहां अन्य राज्यों से चीनी मंगाई जाती है।</p><p>संशोधित प्रावधानों के अंतर्गत 15 अक्टूबर से चीनी के डीलर्स माल का स्टॉक प्राप्त होने के बाद 15 दिनों से ज्यादा समय तक उसे अपने पास नहीं रख सकेंगे और न ही अपने पास किसी भी समय 1000 क्विंटल से अधिक चीनी का स्टॉक रख सकते हैं। यह नियम अपवादों को छोड़कर समूचे देश में एक साथ लागू माना जाएगा। खास क्षेत्र की विशिष्ट जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कोलकाता एवं इसके विस्तारित महानगरीय क्षेत्रों तथा आसाम के डीलर्स को एक साथ 2000 क्विंटल चीनी का स्टॉक अपने पास रखने की अनुमति दी जाएगी।</p><p>कोलकाता के डीलर्स / स्टॉकिस्ट मुख्यतः उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक से चीनी मंगाते हैं और देश के पूर्वी तथा पूर्वोत्तर प्रांतों में उसकी आपूर्ति करते हैं। आसाम के लिए चीनी की ऊंची भंडारण सीमा उसकी भौगोलिक बाधाओं और परिवहन सम्बन्धी समस्याओं को ध्यान में रखकर नियत की गई है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38123</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 16:37:08 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[2015 के बाद 2026 में सबसे कमजोर रहा मानसून]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/2015-2026-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि चालू वर्ष के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश अब तक दीर्घकालीन औसत से करीब 13 प्रतिशत कम हुई है और इस तरह वर्ष 2015 के बाद इस बार मानसून सबसे कमजोर रहा है। मानसून अब देश से वापस लौटने लगा है।&nbsp;</span></p><p>मौसम विभाग के मुताबिक वर्ष 2026 के अखिल भारतीय स्तर पर दीर्घकालीन औसत के सपेक्ष करीब 87 प्रतिशत बारिश हुई जो पिछले 11 साल में सबसे कम है। इतना ही नहीं बल्कि यह 2001 के बाद बारिश का चौथा सबसे निचले स्तर भी है जबकि वर्ष 1901 के बाद 13 वां न्यूनतम स्तर आंका गया है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून पर अल नीनो मौसम चक्र का गहरा असर पड़ा।&nbsp;</p><p>आईएमडी के अनुसार इस वर्ष 1 जून से 30 सितम्बर तक देश भर में कुल संचयी वर्षा 759.4 मि०मी० दर्ज की गई जो सामान्य औसत बारिश 868.6 मि०मी० से 12.6 प्रतिशत कम है। अल नीनो के असर से देश का दक्षिणी एवं पूर्वी भाग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। सामान्य औसत के सापेक्ष इस बार दक्षिण भारत में केवल 76 प्रतिशत एवं पूर्वी राज्यों में महज 74 प्रतिशत वर्षा दर्ज की गई और इस तरह वहां वर्षा की कमी क्रमश: 24 प्रतिशत एवं 26 प्रतिशत पर पहुंच गई।&nbsp;</p><p>देश के पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भाग में इस बार कुल 1016.3 मि०मी० वर्षा हुई जो वर्ष 1901 के बाद सबसे कम आंकी जा रही है जबकि दक्षिण प्रायद्वीप में 542 मि०मी० बारिश हुई जो वर्ष 1901 के बाद चौथा तथा वर्ष 2001 के बाद दूसरा सबसे निचले स्तर रहा। बारिश की भारी कमी से खासकर धान के उत्पादन क्षेत्र में काफी गिरावट आ गई जबकि अन्य खरीफ फसलों की प्रगति पर भी असर पड़ रहा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38121</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 16:07:17 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[उत्पादन में गिरावट की आशंका से अफ्रीका में तुवर का भाव तेज]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मुम्बई। पूर्वी अफ्रीकी देशों में उत्पादन घटने की आशंका से तुवर का भाव ऊंचा एवं तेज हो गया है। इस बार वहां तुवर का उत्पादन उम्मीद से&nbsp; कम होने के संकेत मिल रहे हैं जिससे इसके दाम में करीब 10 प्रतिशत का इजाफा हो गया है लेकिन इसके बावजूद वहां तुवर का भाव भारत में घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य 8450 रुपए प्रति क्विंटल से नीचे है। भारत में म्यांमार के साथ-साथ अफ्रीकी देशों से विशाल मात्रा में तुवर का आयात किया जाता है।&nbsp;</span></p><p>शीर्ष व्यापारिक संस्था- इंडिया पल्सेस एन्ड ग्रेन्स एसोसिएशन के चेयरमैन का कहना है कि अफ्रीकी तुवर काफी सस्ती थी लेकिन उम्मीद से कम उत्पादन होने की संभावना से अब इसका दाम करीब 10 प्रतिशत बढ़ गया है। अब इसकी बिक्री 7000-7500 रुपए प्रति क्विंटल की दर&nbsp; से हो रही है जबकि पहले इसका औसत मूल्य 6500 रुपए प्रति क्विंटल चल रहा था।&nbsp;</p><p>पहले अफ्रीकी देशों में तुवर का उत्पादन गत वर्ष से बेहतर होने की उम्मीद की जा रही थी लेकिन अब जो संकेत मिल रहे उससे प्रतीत होता है कि इसका उत्पादन पिछले साल से कम हो सकता है। इससे उत्पादक देशों में तुवर के निर्यात योग्य स्टॉक में कमी आ सकती है। भारतीय खरीदार वहां तुवर की खरीद के लिए पहले से ही सक्रिय है जिससे कीमत मजबूत बनी हुई है।&nbsp;</p><p>भारत में अफ्रीका के अनेक देशों से भारी मात्रा में तुवर का आयात किया जाता है जिसमें मोजाम्बिक, तंजानिया, सूडान एवं मलावी आदि शामिल हैं। इसके अलावा म्यांमार से भी इसका आयात होता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार चालू कैलेंडर वर्ष के शुरूआती 7 महीनों में यानी जनवरी-जुलाई 2026 के दौरान भारत में तुवर का आयात बढ़कर 5.79 लाख टन पर पहुंच गया जो गत वर्ष की समान अवधि के आयात 4.01 लाख टन से 44 प्रतिशत अधिक है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38119</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 15:42:09 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[क्रूड पाम तेल पर 44 प्रतिशत आयात शुल्क लगाने की मांग]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-44-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">हैदराबाद। एक तरफ केन्द्र सरकार ने क्रूड पाम तेल (सीपीओ) पर आयात शुल्क को 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत नियत कर दिया है तो दूसरी ओर तेलंगाना सरकार इस पर 44 प्रतिशत का सीमा शुल्क लगाने की मांग कर रही है। तेलंगाना के कृषि मंत्री ने कहा है कि स्वदेशी ऑयल पाम उत्पादकों को लाभप्रद मूल्य सुनिश्चित करने तथा पाम की खेती के प्रति उसका उत्साह एवं आकर्षक बढ़ाने के लिए सीपीओ पर 40 प्रतिशत का मौलिक सीमा शुल्क एवं 10 प्रतिशत के अधिभार के साथ कुल 44 प्रतिशत का आयात शुल्क लगाया जाना आवश्यक है।</span></p><p>प्रधानमंत्री, केन्द्रीय वित्त मंत्री एवं कृषि मंत्री सहित अन्य सम्बद्ध मंत्रियों को प्रेषित पत्र में तेलंगाना के कृषि, विपणन एवं सहकारिता मंत्री ने कहा है कि आयात शुल्क में हुई कटौती से घरेलू प्रभाग में सीपीओ के दाम पर दबाव पड़ सकता है और इससे पाम उत्पादकों को ताजे फलों के गुच्छे (एफएफबी) का मिलने वाला मूल्य प्रभावित हो सकता है। </p><p>सरकार ऑयल पाम एवं पाम तेल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने की इच्छुक तो है और इसके लिए प्रयास भी कर रही है लेकिन इस तरह की नीति से उसे अपने उद्देश्य में सफलता नहीं मिल पाएगी और ऑयल पाम के उत्पादक भी हतोत्साहित होंगे।&nbsp;</p><p>तेलंगाना के कृषि मंत्री का कहना है कि आम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा अवश्य होनी चाहिए मगर इसके लिए स्वदेशी पाम उत्पादक किसानो को बलि का बकरा बनाना उचित नहीं है। भारत को खाद्य तेल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनना है तो नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल-ऑयल पाम को सफल बनाना ही होगा और इसके लिए किसानों को प्रोत्साहन देना आवश्यक है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38117</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 13:49:28 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[दलहनों पर आयात शुल्क में हो सकती है कटौती]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश कम होने तथा अल नीनो मौसम चक्र का प्रभाव अगले कई महीनों तक जारी रहने की संभावना को देखते हुए खरीफ के साथ-साथ रबी सीजन में भी दलहन फसलों का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। इसके फलस्वरूप कीमतों में तेजी का माहौल बन सकता है।</span></p><p>घरेलू प्रभाग में आपूर्ति एवं उपलब्धता बढ़ाने तथा कीमतों में तेजी पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार दलहनों पर आयात शुल्क में कटौती करने पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर सकती है। मालूम हो कि खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में पहले ही 5 प्रतिशत एवं 10 प्रतिशत बिंदु की कटौती की जा चुकी है।&nbsp;</p><p>ध्यान देने की बात है कि वर्तमान समय में मूंग के आयात पर प्रतिबंध लगा हुआ है और तुवर तथा उड़द के आयात को सीमा शुल्क से मुक्त रखा गया है इसलिए यदि शुल्क कटौती का निर्णय लिया जाता है तो भी इन तीन दलहनों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर देसी चना एवं मसूर पर 10-10 प्रतिशत तथा पीली मटर पर 30 प्रतिशत का मौलिक आयात शुल्क लागू है जिसे घटाया अथवा समाप्त किया जा सकता है। समझा जाता है कि चना तथा पीली मटर पर शुल्क की दर में परिवर्तन करने का निर्णय जल्दी ही लिया जा सकता है।&nbsp;</p><p>तुवर एवं उड़द के शुल्क मुक्त आयात की समयसीमा 31 मार्च 2027 तक पहले ही नियत हो चुकी है। यदि चना एवं पीली मटर पर सीमा शुल्क घटाया जाता है तो इसके आयात में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है। भारत में चना का आयात मुख्यतः ऑस्ट्रेलिया एवं अफ्रीका से तथा पीली मटर का आयात कनाडा एवं रूस से होता है जबकि मसूर का अधिकांश आयात कनाडा एवं ऑस्ट्रेलिया से किया जाता है। इसके अलावा म्यांमार एवं ब्राजील से उड़द और म्यांमार तथा अफ्रीकी देशों से तुवर का भारी भरकम आयात किया जाता है।&nbsp;</p><p>पिछले एक माह के दौरान चना, मूंग, मटर एवं तुवर के घरेलू बाजार मूल्य में करीब 10 प्रतिशत का इजाफा हो गया। इसमें से 3-5 प्रतिशत की वृद्धि तो पिछले एक सप्ताह में हुई है। दलहनों की पैदावार इस बार घटने की संभावना है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38115</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 13:14:27 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीनी के निर्यात कोटे को वापस लौटाने की समयसीमा बढ़ी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। सरकार ने टैरिफ रेट कोटा (टीआरक्यू) प्रणाली के अंतर्गत 10 लाख टन कच्ची चीनी (रॉ शुगर) के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति&nbsp; प्रदान की थी और विभिन्न मिलर्स / रिफाइनर्स को आयात का कोटा भी आवंटित किया था। बाद में मिलर्स को यह सुविधा दी गई कि जिस कोटे का इस्तेमाल नहीं हुआ उसे वह सरकार को वापस लौटा सकता है ताकि अन्य मिलर्स / रिफाइनर्स को उस कोटे का आवंटन किया जा सके।</span></p><p>अब विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने एक बार फिर गैर इस्तेमाल हुए चीनी के आयात कोटे को वापस लौटाने (सरेंडर करने) की समय सीमा को 15 अक्टूबर 2026 तक बढ़ा दिया है। सरकार ने पहले 31 अक्टूबर 2026 तक चीनी के सम्पूर्ण कोटे का आयात करने की स्वीकृति दी थी।&nbsp;</p><p>डीजीएफटी द्वारा जारी एक सार्वजनिक सूचना में कहा गया है कि टीआरक्यू के कोटा धारक अपनी आवंटित मात्रा के किसी भी भाग का सरेंडर कर सकते हैं। यदि उसे लगता है कि वह सम्पूर्ण आवंटित कोटे में से किसी मात्रा की चीनी का आयात करने में सक्षम नहीं हो पाएगा अथवा उसका आयात करना उसके लिए लाभप्रद साबित नहीं होगा तो वह उस मात्रा को 15 अक्टूबर 2026 तक सरेंडर कर सकता है।&nbsp;</p><p>लेकिन इसके लिए कोटा धारकों को चीनी के निर्यात मूल्य (जितनी मात्रा का सरेंडर किया जा रहा है) के 0.5 प्रतिशत की राशि के साथ कोटे का सरेंडर करना होगा। इसका आंकलन चीनी के दाम, परिवहन खर्च एवं बीमा व्यय के साथ किया जाएगा। इस तरह का नियम पहले से ही निर्धारित है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38113</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 12:31:36 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[तेलंगाना में खरीफ फसलों का क्षेत्रफल 125.85 लाख एकड़ पर पहुंचा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-125-85-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">हैदराबाद। धान, कपास एवं मक्का के अग्रणी उत्पादक राज्यों में शामिल तेलंगाना में इस वर्ष मानसूनी बारिश की कमी के कारण 30 सितम्बर तक खरीफ फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र 125.85 लाख एकड़ पर पहुंच सका जो पिछले साल की समान अवधि के बिजाई क्षेत्र 133.25 लाख एकड़ से 7.40 लाख एकड़ कम है। इस गिरावट में धान के रकबे का योगदान सबसे ज्यादा है।</span></p><p>राज्य कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल की तुलना में वर्तमान खरीफ सीजन के दौरान तेलंगाना में धान एवं मोटे अनाजों का संयुक्त उत्पादन क्षेत्र 74.16 लाख एकड़ से लुढ़ककर 63.13 लाख एकड़ रह गया। इसके तहत धान का उत्पादन क्षेत्र 62.33 लाख एकड़ से घटकर 56.80 लाख एकड़ तथा मक्का का रकबा 6.46 लाख एकड़ से गिरकर 5.93 लाख एकड़ पर अटक गया। ज्वार का क्षेत्रफल 35-36 हजार एकड़ पर स्थिर रहा।&nbsp;</p><p>लेकिन दलहन फसलों का उत्पादन क्षेत्र 5.86 लाख एकड़ से उछलकर 7.98 लाख एकड़ पर पहुंच गया। इसके तहत अरहर (तुवर) का बिजाई क्षेत्र 4.92 लाख एकड़ से बढ़कर 5.58 लाख एकड़, मूंग का क्षेत्रफल 62 हजार एकड़ से उछलकर 1.61 लाख एकड़ तथा उड़द का रकबा 31 हजार एकड़ से बढ़कर 74 हजार एकड़ पर पहुंच गया। दलहन फसलों की बिजाई समाप्त हो चुकी है।&nbsp;</p><p>तिलहन फसलों का उत्पादन क्षेत्र भी 3.76 लाख एकड़ से सुधर कर 3.97 लाख एकड़ पर पहुंचा। इसमें मुख्यतः सोयाबीन की भागीदारी रही। वहां सोयाबीन का उत्पादन क्षेत्र 3.62 लाख एकड़ से बढ़कर 3.72 लाख एकड़ पर पहुंच गया। इसके साथ-साथ मूंगफली का बिजाई क्षेत्र 12 हजार एकड़ से बढ़कर 20 हजार एकड़ हो गया। अरंडी की बिजाई भी बढ़ी है।&nbsp;</p><p>तेलंगाना में कपास का उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष के 46 लाख एकड़ से उछलकर इस बार 48.33 लाख एकड़ पर पहुंच गया। राज्य में खरीफ फसलों की बिजाई का अभियान समाप्त हो गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38111</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 12:05:52 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[दक्षिणी राज्यों में लौटते मानसून से वर्षा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">तिरुअनन्तपुरम। दक्षिण-पश्चिम मानसून का पश्चिमोत्तर भारत से वापस लौटना पहले ही आरंभ हो चुका है और अब यह देश के उत्तरी तथा मध्यवर्ती भाग से होते हुए दक्षिण भारत पहुंचेगा। मौसम विभाग ने 15 अक्टूबर तक देश से इस मानसून के पूरी तरह प्रस्थान कर जाने का अनुमान व्यक्त किया है। इस बीच आज यानी 1 अक्टूबर 2026 से औपचारिक तौर पर उत्तर-पूर्व मानसून का समय शुरू हो गया है मगर इसकी सक्रियता बढ़ने में कुछ वक्त लग सकता है।</span></p><p>दक्षिण भारत में इस बार मानसून काफी कमजोर रहा जिससे वहां दीर्घकालीन औसत के मुकाबले बारिश कम हुई। इससे खरीफ फसलों की बिजाई घट गई। इसके तहत खासकर धान के उत्पादन क्षेत्र में गिरावट आई। अब कर्नाटक, तमिलनाडु एवं केरल जैसे राज्यों में वर्षा का नया दौर आरंभ हुआ है जिससे खरीफ फसलों को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन सूखे की वजह से खरीफ फसलों को पहले से भारी नुकसान हो चुका है उसकी पूरी भरपाई होनी मुश्किल है। दिलचस्प तथ्य यह है कि कम बारिश के बावजूद आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना में दलहन-तिलहन फसलों की बिजाई बढ़ गई। इसके तहत खासकर तुवर एवं उड़द के रकबे में अच्छी बढ़ोत्तरी हुई है।&nbsp;</p><p>उत्तर-पूर्व मानसून के ज्यादा वर्षा दक्षिण भारत में होती है मगर इस बार अल नीनो मोसम चक्र की तीव्रता एवं ताकत बढ़ने से मानसून की वर्षा पर असर पड़ने की संभावना है। दक्षिणी राज्यों के बांधों-जलाशयों में पानी का स्टॉक भी कम बचा है। कर्नाटक में अनेक तहसीलों को सूखा ग्रस्त क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। महाराष्ट्र के कुछ भागों में भी सूखे का गंभीर प्रकोप है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38109</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 11:16:56 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[आंध्र प्रदेश में खरीफ फसलों का रकबा गत वर्ष से पीछे]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">विजयवाड़ा। दक्षिण भारतीय राज्य- आंध्र प्रदेश में यद्यपि हाल के सप्ताहों के दौरान खरीफ फसलों की बिजाई में अच्छी प्रगति हुई है लेकिन फिर भी इसका रकबा गत वर्ष से करीब 2 लाख हेक्टेयर पीछे रह गया। राज्य में इस बार सही समय पर मानसून की अच्छी बारिश नहीं होने से फसलों की बिजाई की रफ्तार आरंभ से ही धीमी रही।&nbsp;</span></p><p>राज्य कृषि विभाग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार आंध्र प्रदेश में इस वर्ष 30 सितम्बर 2026 तक खरीफ फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र 26.79 लाख हेक्टेयर पर ही पहुंच सका जो पिछले साल की समान अवधि के बिजाई क्षेत्र 28.77 लाख हेक्टेयर से 1.98 लाख हेक्टेयर कम है। </p><p>गत वर्ष की तुलना में मौजूदा खरीफ सीजन के दौरान आंध्र प्रदेश में धान का उत्पादन क्षेत्र 15.58 लाख हेक्टेयर से लुढ़ककर 13.88 लाख हेक्टेयर तथा मोटे अनाजों का रकबा 2.43 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.84 लाख हेक्टेयर रह गया। मोटे अनाजों में खासकर मक्का का बिजाई क्षेत्र 1.89 लाख हेक्टेयर से गिरकर 1.32 लाख हेक्टेयर पर अटक गया जबकि बाजरा एवं रागी का क्षेत्रफल गत वर्ष के आसपास ही रहा।&nbsp;</p><p>दूसरी ओर वहां दलहनों का उत्पादन क्षेत्र 3.52 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.09 लाख हेक्टेयर हो गया। इसके तहत तुवर का बिजाई क्षेत्र 3.11 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 3.48 लाख हेक्टेयर तथा उड़द का उत्पादन क्षेत्र 27 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 50 हजार हेक्टेयर पर पहुंच गया।</p><p>तिलहन फसलों का रकबा भी गत वर्ष के 2.27 लाख हेक्टेयर से सुधरकर इस बार 2.29 लाख हेक्टेयर हो गया। इसके तहत यद्यपि मूंगफली का बिजाई क्षेत्र 1.79 लाख हेक्टेयर से गिरकर 1.75 लाख हेक्टेयर रह गया मगर तिल, अरंडी एवं सोयाबीन के क्षेत्रफल में थोड़ी बढ़ोत्तरी हुई। लेकिन कपास का रकबा 4.73 लाख हेक्टेयर से घटकर 4.49 लाख हेक्टेयर पर अटक गया।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38107</guid>				
                <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 10:47:43 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[सरसों एवं मसूर की खेती में किसानों की दिलचस्पी बढ़ने की उम्मीद]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्र सरकार ने रबी सीजन की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 1 से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी है। इसके तहत गेहूं में सबसे कम तथा करडी (कुसुम या सैफ्लावर) में सर्वाधिक बढ़ोत्तरी हुई है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इसी तरह मसूर एवं सरसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी क्रमश: 390 रुपए प्रति क्विंटल एवं 413 रुपए प्रति क्विंटल की भारी बढ़ोत्तरी हुई है जिससे किसानों को इसका रकबा तथा उत्पादन बढ़ाने का अच्छा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। चना के समर्थन मूल्य में&nbsp; 83 रुपए तथा जौ के समर्थन मूल्य में 136 रुपए प्रति क्विंटल का इजाफा किया गया है। सैफ्लावर का समर्थन मूल्य सबसे ज्यादा 675 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा दिया गया है।&nbsp;</span></p><p>केन्द्रीय पूल में गेहूं का विशाल स्टॉक मौजूद है और इसका दाम भी एक निश्चित सीमा में स्थिर बना हुआ है लेकिन देश में दलहन-तिलहन (दालों एवं खाद्य तेलों) का अभाव रहता है इसलिए विदेशों से इसके विशाल आयात की आवश्यकता पड़ती है। मसूर भारत में सर्वाधिक आयात होने वाले दलहनों में से एक है। </p><p>हालांकि सरसों का थोक मंडी भाव इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से काफी ऊंचा चल रहा है जिससे इसकी खेती के प्रति किसानों का उत्साह एवं आकर्षण स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा। मगर सरकार भी अपनी ओर से किसानों को प्रोत्साहित करना चाहती है। सरकार ने रबी कालीन फसलों के उत्पादन का लक्ष्य भी निर्धारित कर दिया है। शीघ्र ही गेहूं, सरसों, चना एवं अन्य रबी फसलों की बिजाई आरंभ होने वाली है लेकिन कुछ राज्यों में सूखे का संकट बना हुआ है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38095</guid>				
                <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 20:00:36 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[राज्यों में दलहन-तलहन की खरीद के लिए 55.48 अरब रुपए की मंजूरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---55-48-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्रीय कृषि मंत्री ने 2026-27 के खरीफ मार्केटिंग सीजन के दौरान तीन राज्यों - उत्तर प्रदेश, तेलंगाना एवं कर्नाटक में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर दलहनों एवं तिलहनों की खरीद के लिए 55.48 अरब रुपए की धनराशि स्वीकृत की है। इन राज्यों में 7.06 लाख टन दलहन-तिलहन की खरीद को मंजूरी दी गई है। इसमें उत्तर प्रदेश की भागीदारी ज्यादा है।</span></p><p>प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में 39.93 अरब रुपए, कर्नाटक में 11.07 अरब रुपए तथा तेलंगाना में 4.48 अरब रुपए मूल्य के दलहन-तिलहन की खरीद का प्रस्ताव स्वीकार किया गया है।&nbsp;</p><p>उत्तर प्रदेश में 4.66 लाख टन अरहर (तुवर) एवं 6250 टन मूंग की खरीद की जाएगी जबकि कर्नाटक में 1,15,500 टन सोयाबीन, 38,250 टन मूंग तथा 13,413 टन सूरजमुखी की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। इसी तरह तेलंगाना में 62 हजार टन सोयाबीन और 10,766 टन मूंग की खरीद का निश्चय किया गया है। मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के अंतर्गत होने वाली इस सरकारी खरीद से किसानों को राहत मिलेगी।&nbsp; &nbsp;</p><p>कृषि मंत्रालय के एक बयान में कहा गया है कि इस निर्णय का उद्देश्य दलहन-तिलहन उत्पादकों को उस समय न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ प्रदान करना है जब थोक मंडी भाव घटकर उससे नीचे आ जाएगा। किसानों को दलहन-तिलहन फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने हेतु सरकार का गंभीर प्रयास निरन्तर जारी है। खरीफ कालीन दलहन-तिलहन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी अच्छी बढ़ोत्तरी की गई है और अब रबी कालीन दलहन-तिलहन फसलों का एमएसपी भी घोषित कर दिया गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38093</guid>				
                <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 19:58:11 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[इंडोनेशिया में सीपीओ का उत्पादन 9 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-9-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">जकार्ता। अल नीनो मौसम चक्र के प्रकोप से बारिश कम होने की आशंका को देखते हुए इंडोनेशिया में अगले साल क्रूड पाम तेल (सीपीओ) के उत्पादन में करीब 9 प्रतिशत की भारी गिरावट आने की संभावना व्यक्त की जा रही है। अल नीनो की वजह से मलेशिया में भी सीपीओ का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। ज्ञात हो कि इंडोनेशिया और मलेशिया दुनिया में पाम तेल के दो सबसे प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देश है। थाईलैंड का पाम तेल उत्पादन भी इसकी चपेट में आ सकता है।&nbsp;</span></p><p>एक अग्रणी कॉमोडिटी परामर्श फर्म के एमडी का कहना है कि वर्ष 2027 के दौरान इंडोनेशिया में सीपीओ का उत्पादन 2026 के मुकाबले करीब 9 प्रतिशत घटकर 469 लाख टन पर सिमट सकता है। यदि अल नीनो के प्रकोप से लम्बे समय तक सूखे का प्रभाव बरकरार रहा तो दक्षिण-पूर्व एशिया में पाम तेल का उत्पादन काफी घट सकता है। </p><p>विश्लेषक के मुताबिक फिलहाल इन दोनों क्षेत्रों में अल नीनो का असर उतना गंभीर और व्यापक नहीं है जितना वर्ष 2015 में देखा गया था। अगर अगले साल वहां मानसून की स्थिति ठीक नहीं रही तो हालात बदल सकते हैं। सितम्बर 2026 में इन दोनों देशों में मौसम शुष्क रहा और अक्टूबर में भी पर्याप्त वर्षा होने में संदेह है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार नवम्बर में वहां अच्छी बारिश हो सकती है।&nbsp;</p><p>इंडोनेशिया में बायो डीजल निर्माण में पाम तेल की विशाल मात्रा का उपयोग होने से इसके निर्यात योग्य स्टॉक में पहले से ही कमी आने की आशंका व्यक्त की जा रही है। ऐसी स्थिति में यदि उत्पादन में भारी गिरावट आती है तो पाम तेल का निर्यात प्रदर्शन और भी कमजोर पड़ सकता है। इससे भारत और चीन जैसे शीर्ष आयातक देशों की कठिनाई बढ़ सकती है।&nbsp; &nbsp; &nbsp;</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38091</guid>				
                <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 19:33:04 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मगज-तरबूज की कीमतों में तेजी- अभी मंदे की संभावना नहीं]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-----]]></link>                
                <description><![CDATA[<p style="text-align: justify; "><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। वर्तमान में मगज-तरबूज के भाव दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं क्योंकि एक ओर हाजिर में त्यौहारी मांग अच्छी चल रही है वहीं दूसरी ओर चालू सीजन के दौरान अभी तक सरकार ने आयात का नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है साथ ही देसी मालों की सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। जिस कारण से कीमतों में तेजी का दौर बना हुआ है अभी ओर भाव बढ़ने की संभावना है।&nbsp;&nbsp;</span></p><p style="text-align: justify; ">उल्लेखनीय है कि हाजिर में माल का स्टॉक कमजोर रह जाने एवं बढ़ती मांग के कारण चालू सप्ताह के दौरान अभी तक मगज-तरबूज के भाव 100/110 रुपए प्रति किलो तेजी के साथ बोले जाने लगे हैं और जोधपुर मंडी में 7 स्टार सूडान का भाव 621 रुपए पर बोला गया जोकि चालू सप्ताह के शुरू में 510 रुपए खुला था। 5 स्टार देसी का भाव जोकि सप्ताह के शुरू में 475 रुपए चल रहा था वर्तमान में बढ़कर 590 रुपए हो गया है। सूत्रों का कहना है कि आगामी दिनों में त्यौहारी सीजन होने के कारण मांग अच्छी रहेगी। जिस कारण से अभी भाव और बढ़ने की संभावना है।</p><p style="text-align: justify; "><b>फसल की स्थिति&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; ">जानकार सूत्रों का कहना है कि दीपावली के आसपास आने वाली फसल इस वर्ष गत वर्ष की तुलना में कम रहने के अनुमान लगाए जा रहे है क्योंकि इस वर्ष पानी की कमी के चलते उत्पादन प्रभावित रहेगा। गत वर्ष देश में मगज-तरबूज का उत्पादन लगभग 3/3.50 लाख बोरी (प्रत्येक बोरी 50/60 किलो) का माना गया था।&nbsp;&nbsp;</p><p style="text-align: justify; "><b>2023 में बना था रिकॉर्ड भाव&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; ">प्राप्त जानकारी के अनुसार सूडान में गृह युद्ध के चलते मगज-तरबूज का आयात कम रहा था साथ ही देश में भी पैदावार कम रही थी। जिस कारण नवम्बर-दिसम्बर- 2023 के दौरान राजस्थान की मंडियों में मगज-तरबूज का रिकॉर्ड भाव 820/830 रुपए बन गया था।&nbsp;</p><p style="text-align: justify; "><b>आयात&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; ">कॉमर्स डिपार्टमेंट ऑफ इंडिया द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025-26 (अप्रैल-मार्च) के दौरान मगज तरबूज का आयात केवल 5211 टन का रहा जबकि वर्ष 2024-25 में आयात 86273 टन का रहा था। वर्ष 2023-24 में आयात 35750 टन एवं वर्ष 2022-23 में आयात 65989 टन का हुआ था।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38089</guid>				
                <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 19:15:40 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[दाल मिलों की मजबूत खरीद से तुवर में तेजी, दूसरे दिन भी भाव बढ़े]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">दाल मिलों की लगातार खरीद के समर्थन से घरेलू बाजार में तुवर के भाव दूसरे दिन भी तेज रहे। बर्मा में भी तुवर की कीमतों में बढ़त दर्ज होने से घरेलू बाजार की धारणा को मजबूती मिली। दाल मिलों की सक्रिय लिवाली के चलते अरहर के भावों में सुधार जारी है।</span></p><p>व्यापारियों के अनुसार, बर्मा से अरहर के आयात पड़ते महंगे होने के कारण आयातकों की लागत बढ़ी हुई है। वहीं, खपत का सीजन शुरू होने से अरहर दाल की मांग आगे भी बनी रहने की उम्मीद है, जिससे बाजार को सहारा मिल रहा है।</p><p><b>महाराष्ट्र-कर्नाटक में कम बारिश से उत्पादन पर नजर</b></p><p>चालू खरीफ सीजन में प्रमुख तुवर उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक में सामान्य से कम बारिश की स्थिति रही है। इसके चलते फसल की उत्पादकता और कुल उत्पादन अनुमान पर दबाव आने की आशंका जताई जा रही है। साथ ही, नई फसल की मंडियों में आवक शुरू होने में भी देरी संभव है।</p><p><b>ब्राजील से आयात अक्टूबर-नवंबर में संभव</b></p><p>दलहन एसोसिएशन के अनुसार, अक्टूबर-नवंबर में ब्राजील से अरहर का आयात शुरू होने की संभावना है। चालू वर्ष में ब्राजील से करीब 20,000–30,000 टन अरहर आने का अनुमान है। हालांकि, अगले वर्ष से ब्राजील से अरहर के आयात में और बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है।</p><p>बाजार संकेत: मजबूत मिल मांग, महंगे आयात पड़ते और नई फसल की संभावित देरी फिलहाल तुवर बाजार को समर्थन दे रहे हैं। आगे बाजार की दिशा घरेलू मांग, नई फसल की आवक और आयातित तुवर की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38087</guid>				
                <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 18:01:29 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कमजोर बिकवाली से चना में तेजी, MSP बढ़ने से बाजार को सहारा]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-msp-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। कमजोर बिकवाली और दाल मिलों की बढ़ती खरीद के चलते चना बाजार में आज तेजी का रुख रहा। विभिन्न बाजारों में चना के भाव में 100 रुपये प्रति क्विंटल तक की तेजी दर्ज की गई। निचले भाव पर मिलों की खरीद बढ़ने के साथ बाजार में बिकवाली सीमित रहने से भाव को मजबूती मिली।</span></p><p>इसी बीच केंद्र सरकार ने रबी विपणन सीजन 2027-28 के लिए चना का MSP 83 रुपये बढ़ाकर 5,958 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। इससे पिछला MSP 5,875 रुपये प्रति क्विंटल था।</p><p><b>नवंबर तक मांग बने रहने की उम्मीद</b></p><p>व्यापारियों के अनुसार चना में खपत का सीजन चल रहा है, जिसके चलते नवंबर तक मांग बनी रहने की उम्मीद है। अधिकांश दाल मिलों के पास चना का पुराना स्टॉक सीमित है, जबकि उत्पादक मंडियों में देसी चना की आवक भी अपेक्षित स्तर पर नहीं बन रही है। </p><p>इसके अलावा बंदरगाहों पर आयातित चना का स्टॉक भी सीमित बताया जा रहा है और तंजानिया से आयात फिलहाल सीमित मात्रा में हो रहा है। इन परिस्थितियों में बाजार में निचले भाव पर मिलों की खरीद और कमजोर बिकवाली का असर दिखाई दे रहा है। </p><p>हालांकि, आगे की तेजी काफी हद तक मांग, मंडियों की आवक और आयातित चना की उपलब्धता पर निर्भर करेगी। सीमित बिकवाली, मिलों की सक्रिय खरीद और खपत सीजन के कारण फिलहाल चना बाजार को मजबूती मिल रही है, जबकि बढ़े हुए MSP ने भी बाजार की धारणा को सहारा दिया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/38085</guid>				
                <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 17:49:13 +0530</pubDate>
            </item>
                
    </channel>

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