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        <title><![CDATA[ Igrain India ]]></title>
        <link><![CDATA[ https://igrain.in/feeds ]]></link>
        <description><![CDATA[ Igrain India ]]></description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Wed, 13 May 2026 21:18:07 +0530</pubDate>
  
                    <item>
                <title><![CDATA[रूई के वैश्विक उत्पादन में 5 प्रतिशत की कमी आने की संभावना]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-5-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">न्यूयार्क। रूई के वैश्विक उत्पादन में इस वर्ष 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आने की संभावना है। अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) की मासिक रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 के सीजन में 1226.40 लाख गांठ (480 पौंड की प्रत्येक गांठ) रूई का वैश्विक उत्पादन हुआ था </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">जो 2026-27 के मार्केटिंग सीजन (अगस्त-जुलाई) में घटकर 1160.40 लाख गांठ रह जाने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि दुनिया के विभिन्न उत्पादक देशों में रूई का मार्केटिंग सीजन अलग-अलग महीनों में होता है। अमरीका में यह अगस्त से जुलाई के दौरान तथा भारत में अक्टूबर से सितम्बर के दौरान रूई का मार्केटिंग सीजन रहता है।&nbsp;</span></p><p>उस्डा की रिपोर्ट के अनुसार 2026-27 सीजन के आरंभ में विश्व स्तर पर 772.70 लाख गांठ रूई का पिछला बकाया स्टॉक मौजूद रहने की संभावना है जबकि सीजन के दौरान 433.70 लाख गांठ रूई का आयात-निर्यात हो सकता है। 2026-27 के सीजन में रूई की कुल वैश्विक खपत 1216.90 लाख गांठ होने की संभावना है जो इसके कुल अनुमानित उत्पादन से काफी अधिक है। </p><p>इसके फलस्वरूप बकाया अधिशेष स्टॉक में स्वाभाविक रूप से गिरावट आ जाएगी। रूई का वैश्विक बकाया स्टॉक 2026-27 सीजन के अंत में घटकर 718.40 लाख गांठ पर सिमट जाने का अनुमान है। 2025-26 के सीजन में विश्व स्तर पर रूई का कुल उपयोग 1201.30 लाख गांठ तथा आयात-निर्यात 437.80 लाख गांठ दर्ज किया गया था।&nbsp;</p><p>उस्डा ने भारत में रूई का उत्पादन 2025-26 सीजन के 238 लाख गांठ से सुधरकर 2026-27 में 240 लाख गांठ पर पहुंचने का अनुमान लगाया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32597</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 19:55:33 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चावल का वैश्विक उत्पादन 53.782 करोड़ टन पर अटकने की संभावना]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-53-782-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। हालांकि अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) ने अपनी नवीनतम मासिक रिपोर्ट में चावल का वैश्विक उत्पादन 2025-26 सीजन के 54.282 करोड़ टन से कुछ घटकर 2026-27 के सीजन में 53.782 करोड़ टन रह जाने की संभावना व्यक्त की है मगर बकाया अधिशेष स्टॉक ऊंचा होने से चावल की कुल वैश्विक उपलब्धता 73.387 करोड़ टन से सुधरकर 73.412 करोड़ टन पर पहुंच जाने का अनुमान लगाया है।&nbsp;</span></p><p>उस्डा की रिपोर्ट में 2025-26 सीजन के मुकाबले 2026-27 सीजन के दौरान चावल के वैश्विक व्यापार एवं उपयोग में बढ़ोत्तरी का अनुमान लगाया गया है लेकिन उत्पादन एवं अंतिम अधिशेष स्टॉक में गिरावट आने की संभावना व्यक्त की गई है।&nbsp;</p><p>समीक्षाधीन सीजन के दौरान चावल की वैश्विक खपत 38.30 लाख टन की वृद्धि के साथ 54.139 करोड़ टन के नए&nbsp; रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाने की उम्मीद है। भारत में चावल का उपयोग तेजी से बढ़कर 12.80 करोड़ टन के शीर्ष स्तर पर पहुंचने के आसार हैं जो 2025-26 सीजन की खपत 12.40 करोड़ टन से 40 लाख टन ज्यादा है। </p><p>लेकिन चीन में चावल की खपत इसी अवधि में 14.723 करोड़ टन से घटकर 14.510 करोड़ टन रह जाने की संभावना है। चावल का वैश्विक व्यापार भी 602.80 लाख टन से बढ़कर 630.10 लाख टन पर पहुंच सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32595</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 19:52:23 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[गेहूं के वैश्विक उत्पादन में गिरावट आने का उस्डा का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">वाशिंगटन। अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) ने गेहूं का वैश्विक उत्पादन 2025-26 के रिकॉर्ड स्तर 84.384 करोड़ टन से घटकर 2026-27 के सीजन में 81.906 टन पर सिमट जाने का अनुमान लगाया है। अपनी नवीनतम मासिक रिपोर्ट में उस्डा ने कहा है कि गेहूं के उत्पादन में आने वाली इस गिरावट में सर्वाधिक योगदान प्रमुख निर्यातक देशों का रहेगा जिसमें अमरीका, यूरोपीय संघ, अर्जेन्टीना एवं ऑस्ट्रेलिया आदि शामिल हैं।&nbsp;</span></p><p>उस्डा की रिपोर्ट के मुताबिक गेहूं की वैश्विक खपत में भी कुछ कमी आने की संभावना है। 2025-26 के सीजन में गेहूं का कुल वैश्विक उपयोग 82.352 करोड़ टन होने का अनुमान है जो 2026-27 के सीजन में गिरकर 82.323 करोड़ टन पर अटक सकता है। हालांकि सामान्य मानवीय खाद्य उद्देश्य में गेहूं की खपत लगभग स्थिर रहेगी लेकिन पशु आहार (फीड) निर्माण तथा अवशिष्ट उपयोग में खपत घटने की संभावना है। </p><p>संसार के अधिकांश अग्रणी उत्पादक देशों में जून का उत्पादन घटने तथा खाद्य, बिजाई (सीडिंग) एवं अवशिष्ट उद्देश्य में मांग बढ़ने से उन देशों में फीड उद्देश्य के लिए स्टॉक&nbsp; कम बचेगा। गेहूं की मांग एवं खपत में सर्वाधिक वृद्धि भारत में होने की संभावना है क्योंकि इसकी जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और इसके घरेलू प्रभाग में गेहूं का पर्याप्त स्टॉक भी उपलब्ध है। भारत सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गेहूं की आपूर्ति बढ़ाने का प्रयास कर सकती है।&nbsp;</p><p>गेहूं का वैश्विक व्यापार 119.82 लाख टन की गिरावट के साथ 21.17 करोड़ टन पर अटकने की संभावना है। प्रमुख निर्यातक देशों में इसका स्टॉक कम रहेगा तथा उत्तरी अफ्रीका एवं पश्चिम एशिया में मांग कमजोर रह सकती है। रूस 2026-27 के सीजन में भी दुनिया का सबसे प्रमुख गेहूं निर्यातक देश बना रहेगा। इसके बाद यूरोपीय संघ, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमरीका, यूक्रेन एवं अर्जेन्टीना का नंबर रह सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32593</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 19:18:03 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[बादामगिरी में तेजी : मंदे की संभावना नहीं]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p style="text-align: justify; "><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। अमेरिका एवं ऑस्ट्रेलिया में बादाम उत्पादन गत वर्ष की तुलना में कम होने के अनुमानों एवं डॉलर की मजबूती के चलते हाल ही में बादामगिरी के भावों में 40/50 रुपए प्रति किलो की तेजी दर्ज की जा चुकी है। अभी भी बाजार में धारणा तेजी की बनी हुई है। क्योंकि अप्रैल माह में बादाम का आयात भी कम हुआ है।&nbsp;</span></p><p style="text-align: justify; "><b>आयात कम</b></p><p style="text-align: justify; ">हाजिर में कमजोर मांग एवं कैलिफोर्निया में भाव बढ़ने के अलावा अप्रैल माह के दौरान आयातकों ने बादाम का आयात कम मात्रा में किया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अप्रैल-2026 में बादाम का आयात 1000 कंटेनर का किया गया है जबकि गत वर्ष अप्रैल-2025 में आयात 1454 कंटेनर का किया गया था। उल्लेखनीय है कि जनवरी- 2026 में बादाम का आयात 1234 कंटेनर, फरवरी 1310 कंटेनर एवं मार्च- 2026 में 1241 कंटेनर का आयात व्यापार हुआ है।&nbsp;</p><p style="text-align: justify; "><b>कीमतों में तेजी&nbsp;</b></p><p style="text-align: justify; ">चालू माह के दौरान बादामगिरी में अच्छी तेजी दर्ज की गई है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अप्रैल माह के अंत में दिल्ली बाजार में बादामगिरी का भाव 790/800 रुपए प्रति किलो बोला जा रहा था जोकि वर्तमान में बढ़कर 850/860 रुपए प्रति किलो का हो गया है। सूत्रों का मानना&nbsp; है कि वर्तमान निर्यात को देखते हुए संभावना व्यक्त की जा रही है कि जल्द ही भाव 900 रुपए के आसपास बन जाएगा। गत वर्ष इसी समयावधि में दिल्ली बाजार में बादामगिरी का भाव 810/820 रुपए का चल रहा था।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32591</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 18:43:49 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[सोना-चांदी पर आयात शुल्क में भारी बढ़ोत्तरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की तेज निकासी को नियंत्रित करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों खाद्य तेलों की खपत घटाने, पेट्रोल-डीजल के उपयोग में संयम बरतने तथा स्थिति सामान्य होने तक लोगों से सोना-चांदी की खरीदारी अनावश्यक रूप से नहीं करने की अपील की थी। इसके बाद से ही कयास लगाया जा रहा था कि सरकार इन वस्तुओं की खरीदारी से लोगों को हतोत्साहित करने के लिए कोई एहतियाती कदम उठाएगी। सोना-चांदी पर आयात शुल्क में वृद्धि के रूप में यह सामने आ गया।&nbsp;</span></p><p>सोना-चांदी पर पहले 5 प्रतिशत का बुनियादी आयात शुल्क तथा 1 प्रतिशत का कृषि ढांचा एवं विकास सेस के साथ कुल 6 प्रतिशत का सीमा शुल्क लगा हुआ था। अब सरकार ने बुनियादी आयात शुल्क को बढ़ाकर 10 प्रतिशत एवं कृषि ढांचा विकास सेस को बढ़ाकर 5 प्रतिशत नियत कर दिया है जिससे कुल सीमा शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़कर 15 प्रतिशत हो गया है। इस शुल्क वृद्धि को तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिया गया है।&nbsp;</p><p>पश्चिम एशिया में जारी संकट तथा वैश्विक बाजार मूल्य में हुई बढ़ोत्तरी के कारण खाद्य तेलों का आयात काफी महंगा हो गया है। एक अग्रणी उद्योग संगठन द्वारा सरकार से किराया भाड़ा सब्सिडी देने की मांग की जा रही है ताकि खाद्य तेलों के घरेलू बाजार भाव को स्थिर रखा जा सके। लेकिन प्रधानमंत्री चाहते हैं कि देश में खाद्य तेलों की खपत घटे। इससे दुविधा की स्थिति उत्पन्न हो गई है। खाद्य तेलों का घरेलू बाजार भाव पहले से ही काफी ऊंचे स्तर पर चल रहा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32589</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 17:26:43 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में अच्छी बढ़ोत्तरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्र सरकार ने 2025-26 की तुलना में 2026-27 के खरीफ मार्केटिंग सीजन के लिए केवल मक्का एवं मूंग को छोड़कर अन्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी बढ़ोत्तरी कर दी है। इससे किसानों को विभिन्न फसलों का क्षेत्रफल बढ़ाने का प्रोत्साहन मिलेगा। खरीफ फसलों की बिजाई अगले महीने (जून) से शुरू होने वाली है। आर्थिक मामलों की केन्द्रीय कैबिनेट समिति (सीसीईए) की आज हुई महत्वपूर्ण बैठक में खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को अनुमोदित किया गया।&nbsp;</span></p><p>इसके तहत 2025-26 सीजन के मुकाबले 2026-27 के खरीफ सीजन हेतु धान का एमएसपी 72 रुपए बढ़ाया गया है जिससे यह सामान्य श्रेणी के लिए 2369 रुपए से बढ़कर 2441 रुपए प्रति क्विंटल तथा 'ए' ग्रेड के लिए 2389 रुपए से बढ़कर 2461 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है।&nbsp;</p><p>मोटे अनाजों में ज्वार के एमएसपी में 324 रुपए की बढ़ोत्तरी की गई है। इसके साथ ही हाईब्रीड ज्वार का एमएसपी 3699 रुपए से बढ़कर 4023 रुपए प्रति क्विंटल तथा मलदंडी ज्वार का एमएसपी 3749 रुपए से बढ़कर 4073 रुपए प्रति क्विंटल पर पहुंच गया है। </p><p>बाजरा का एमएसपी 2775 रुपए से 125 रुपए बढ़ाकर 2900 रुपए प्रति क्विंटल तथा रागी का एमएसपी 4886 रुपए से 319 रुपए बढ़ाकर 5205 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। मक्का के एमएसपी में आश्चर्यजनक रूप से केवल 10 रुपए का इजाफा किया गया है जिससे यह 2400 रुपए से सुधरकर 2410 रुपए प्रति क्विंटल पर पहुंचा है।&nbsp;</p><p>जहां तक दलहन फसलों का सवाल है तो 2025-26 के मुकाबले 2026-27 सीजन के लिए अरहर (तुवर) का एमएसपी 8000 रुपए से 450 रुपए बढ़ाकर 8450 रुपए प्रति क्विंटल तथा उड़द का एमएसपी 7800 रुपए से 400 रुपए बढ़ाकर 8200 रुपए प्रति क्विंटल नियत किया गया है मगर मूंग के एमएसपी में केवल 12 रुपए की वृद्धि की गई है जिससे यह 8768 रुपए से बढ़कर 8780 रुपए प्रति क्विंटल पर पहुंचा है।&nbsp;</p><p>तलहन फसलों में मूंगफली का एमएसपी 2025-26 सीजन के 7263 रुपए से 254 रुपए बढ़ाकर 7517 रुपए प्रति क्विंटल, सूरजमुखी का एमएसपी 7721 रुपए से 622 रुपए बढ़ाकर 8343 रुपए प्रति क्विंटल, तिल का समर्थन मूल्य 9846 रुपए से 500 रुपए बढ़ाकर 10346 रुपए प्रति क्विंटल, सोयाबीन का एमएसपी 5328 रुपए से 380 रुपए बढ़ाकर 5708 रुपए तथा नाइजरसीड का समर्थन मूल्य 9537 रुपए से 515 रुपए बढ़ाकर 10052 रुपए प्रति क्विंटल नियत किया गया है। </p><p>कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 557 रुपए प्रति क्विंटल का जोरदार इजाफा किया गया है जिससे यह मीडियम ग्रेड के लिए 7710 रुपए से बढ़कर 8267 रुपए प्रति क्विंटल तथा लम्बे रेशेवाली किस्मों के लिए 8110 रुपए से बढ़कर 8667 रुपए प्रति क्विंटल पर पहुंच गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32587</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 16:43:49 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[केन्द्रीय पूल के लिए गेहूं की सरकारी खरीद 300 लाख टन के पार]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-300-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। चालू रबी मार्केटिंग सीजन के दौरान केन्द्रीय पूल के लिए गेहूं की सरकारी खरीद 300 लाख टन से ऊपर पहुंच गई है और अब 345 लाख टन के निर्धारित लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रही है। इतना ही नहीं बल्कि वर्तमान मार्केटिंग सीजन में पहली बार गेहूं की खरीद की मात्रा गत वर्ष की समान अवधि से ऊपर पहुंची है जबकि पिछले 40 दिनों से यह पीछे चल रही थी।</span></p><p>आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार चालू रबी मार्केटिंग सीजन में 12 मई 2026 तक सरकारी एजेंसियों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर किसानों से कुल 301.50 लाख टन गेहूं खरीदा गया जो पिछले सीजन की इसी अवधि की सकल खरीद 291.70 लाख टन से करीब 3 प्रतिशत ज्यादा है। मालूम हो कि 7 मई तक गेहूं की खरीद गत वर्ष से 3 प्रतिशत पीछे चल रही थी।&nbsp;</p><p>महत्वपूर्ण बात यह है कि मध्य प्रदेश में हाल के दिनों में गेहूं की खरीद में भारी प्रगति हुई है। अभी तक वहां गत वर्ष से कम गेहूं खरीदा जा रहा था लेकिन अधिकारियों का दावा है कि अगले सप्ताह तक यह अंतर समाप्त हो जाएगा। पिछले साल की खरीद की मात्रा अब स्थिर हो गई है जबकि चालू सीजन की खरीद में अच्छी प्रगति देखी जा रही है।&nbsp;</p><p>केन्द्रीय खाद्य मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल की तुलना में चालू मार्केटिंग सीजन के दौरान गेहूं की सरकारी खरीद पंजाब में 117.90 लाख टन से बढ़कर 121.60 लाख टन पर पहुंच गया। हरियाणा में खरीद करीब 15 लाख टन अधिक हुई है। </p><p>दरअसल इन दोनों प्रांतों में इस बार रियायती गुणवत्ता नियम (यूआरएस) वाली श्रेणी के गेहूं का उत्पादन ज्यादा हुआ है और किसान इसका स्टॉक अपने पास नहीं रखना चाहते हैं क्योंकि एक तो उसके जल्दी खराब होने का डर रहेगा और दूसरे, खुले बाजार में उसका दाम भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे रहने की संभावना होगी। </p><p>राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भी यूआरएस गेहूं की अधिक खरीद हुई है। केवल मध्य प्रदेश में गेहूं की क्वालिटी अच्छी है। वहां खरीद की प्रक्रिया लम्बे समय तक जारी रहने की उम्मीद है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32585</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 16:06:15 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[अमरीका के मैदानी इलाकों में भयंकर सूखा पड़ने से गेहूं पर असर]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">शिकागो। अमरीका में गेहूं का उत्पादन 2026-27 के सीजन में लुढ़ककर वर्ष 1972 के बाद सबसे निचले स्तर पर सिमट जाने की आशंका है क्योंकि वहां मैदानी इलाकों में भयंकर सूखा पड़ने से सख्त लाल शीतकालीन गेहूं की फसल बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना है।&nbsp;</span></p><p>अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में सोयाबीन का उत्पादन बढ़कर अब तक के दूसरे सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच सकता है मगर मक्का के उत्पादन में गत वर्ष के मुकाबले 6 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।&nbsp;</p><p>अमरीका दुनिया में गेहूं के पांच शीर्ष उत्पादक एवं निर्यातक देशों में शामिल है। वहां इसका सर्वाधिक उत्पादन शीतकाल में ही होता है। उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका से शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (सीबोट) में बेंचमार्क सख्त लाल शीतकालीन गेहूं तथा मुलायम (सॉफ्ट) लाल शीतकालीन गेहूं का वायदा भाव उछलकर 45 सेंट प्रति बुशेल की दैनिक व्यापारिक सीमा को भी पार कर गया।&nbsp;</p><p>उस्डा ने 2026-27 सीजन के दौरान अमरीका में गेहूं का उत्पादन 1.561 अरब बुशेल से काफी कम है। इसके तहत सख्त लाल गेहूं के उत्पादन में 25 प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32582</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:29:02 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[नई तकनीक के साथ ही कॉटन मिशन की सफलता संभव]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। वर्ष 2002 में केन्द्र सरकार ने टेक्नोलॉजी मिशन ऑन कॉटन की लांचिंग की थी और देश के नौ (अब दस) राज्यों में बीटी कॉटन के व्यावसायिक उत्पादन की स्वीकृति प्रदान की थी। उससे पूर्व भारत में केवल परम्परागत किस्मों की कपास की खेती होती थी और फसल को अक्सर कीड़ों-रोगों से भारी नुकसान होने के कारण विदेशों से भारी मात्रा में रूई का आयात करने के लिए विवश होना पड़ता था। बीटी कॉटन के बारे में दावा किया गया था कि यह आधुनिक पीढ़ी की कपास की ऐसी विकसित किस्म है जिसकी उपज दर ऊंची होती है और जिसमें कीड़ों-रोगों के आघात से स्वय की सुरक्षा करने की अधिक क्षमता मौजूद रहती है।</span></p><p>बीटी कॉटन की व्यावसायिक खेती बड़े पैमाने पर आरंभ होने के बाद भारत में रूई का उत्पादन तेजी से बढ़ने लगा और कुछ ही वर्षों में भारत इसके आयात से निर्यातक देश में बदल गया। इसके साथ-साथ देश में रूई की मांग एवं खपत तेजी से बढ़ने लगी। </p><p>यह सिलसिला कुछ वर्षों तक जारी रहा लेकिन उसके बाद रूई की उपज दर एवं पैदावार लगभग स्थिर होने लगी। पिछले दो-तीन वर्षों से इसके उत्पादन में गिरावट का माहौल देखा जा रहा है। लागत खर्च बढ़ने एवं बाजार भाव नीचे रहने से कपास की खेती के प्रति भारतीय किसानों का उत्साह एवं आकर्षण भी घटता जा रहा है।&nbsp;</p><p>अब केन्द्र सरकार ने कपास की उपज दर एवं पैदावार बढ़ाने तथा रूई की क्वालिटी में सुधार लाने के उद्देश्य से नया कॉटन मिशन आरंभ किया है। इसके लिए विशाल धनराशि भी आवंटित की गई है। भारत में कपास के बिजाई क्षेत्र की कोई खास समस्या नहीं है लेकिन यहां रूई की औसत उपज दर बहुत नीचे है। </p><p>इसके अलावा रूई की क्वालिटी भी सर्वोच्च स्तर की नहीं होती है। इन दोनों मोर्चे पर मौजूद चुनौतियों से निपटने के लिए नई-नई तकनीक एवं आधुनिक कृषि प्रणाली को बड़े पैमाने पर अपनाने की आवश्यकता है। कॉटन मिशन को इस पर विशेष रूप से ध्यान देना होगा तभी उसके प्रयासों की सफलता सुनिश्चित हो सकती है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32580</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:15:50 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[खुदरा खाद्य महंगाई की दर अप्रैल में 4.2 प्रतिशत पर पहुंची]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-4-2-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित खुदरा खाद्य महंगाई की दर लगातार चार महीने से बढ़ते हुए अप्रैल 2026 में 4.2 प्रतिशत पर पहुंच गई जो आम लोगों एवं सरकार के साथ-साथ भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए भी चिंता का विषय है। अप्रैल में टमाटर तथा नारियल सहित कुछ अन्य वस्तुओं का दाम तेज हो गया।</span></p><p>अखिल भारतीय स्तर पर उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक अप्रैल में मार्च के मुकाबले 0.25 प्रतिशत बढ़ गया। मार्च 2026 में खाद्य महंगाई की दर 3.87 प्रतिशत दर्ज की गई थी। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2024 में मई से दिसम्बर के सात महीनों में खाद्य महंगाई दर ऋणात्मक बनी हुई थी जबकि जनवरी में यह 2.13 प्रतिशत के घनात्मक जोन में आ गई।</p><p>उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यद्यपि अप्रैल 2025 की तुलना में अप्रैल 2026 के दौरान प्याज के दाम में 17.67 प्रतिशत, आलू के भाव में 23.69 प्रतिशत एवं मटर के मूल्य में 6.75 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई लेकिन दूसरी ओर कोपरा की कीमत में 44 प्रतिशत एवं टमाटर की कीमत में 35 प्रतिशत का इजाफा हुआ।</p><p> विशेषज्ञों के अनुसार कुछ सब्जियों एवं दाल-दलहनों का भाव गत वर्ष से नीचे चल रहा है लेकिन खाद्य तेलों तथा कुछ अन्य जिंसों का दाम ऊंचा होने से आगामी महीनों में खाद्य महंगाई की दर कुछ और बढ़ सकती है। अल नीनो के खतरे एवं पश्चिम एशिया में जारी संकट का भी खाद्य महंगाई पर सकारात्मक असर पड़ने की संभावना है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32578</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:03:27 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मानसून-पूर्व की खरीदारी से कालीमिर्च का भाव मजबूत]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">कोच्चि। घरेलू प्रभाग में कालीमिर्च का भाव काफी हद तक मजबूत बना हुआ है क्योंकि दिसावरी व्यापारियों एवं निर्यातकों के साथ-साथ मसाला उत्पाद के निर्माताओं द्वारा भी इसकी खरीद में अच्छी दिलचस्पी दिखाई जा रही है। समझा जाता है कि सभी सम्बद्ध पक्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश शुरू होने से पूर्व अधिक से अधिक मात्रा में कालीमिर्च खरीद कर इसका स्टॉक सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। मानसून सीजन के दौरान जोरदार वर्षा एवं बाढ़ आदि के कारण यातायात में कठिनाई होती है।&nbsp;</span></p><p>व्यापार विश्लेषकों के अनुसार उत्तरी भारत की कई ग्राइंडिंग फैक्ट्रियां मानसून सीजन से पहले कच्चे माल का उचित भंडार बनाने के उद्देश्य से कालीमिर्च की खरीद में सक्रियता दिखा रही है। इससे घरेलू बाजार में कालीमिर्च की नियमित रूप से अच्छी मांग देखी जा रही है।&nbsp;</p><p>कोच्चि के टर्मिनल मार्केट में रोजाना औसतन 15-20 टन कालीमिर्च की आवक हो रही है और सामान्य कारोबार के साथ वहां गार्बल्ड श्रेणी का भाव 720 रुपए प्रति किलो तथा अनगार्बल्ड किस्म का दाम 700 रुपए प्रति क्विंटल पर मजबूती से स्थिर बना हुआ है।</p><p>भारतीय कालीमिर्च एवं मसाला व्यापार संघ (इप्सता) का कहना है कि प्रत्येक वर्ष मानसून के आने से पहले कालीमिर्च की अच्छी खरीद बिक्री होती है। यह परम्परागत परिपाटी है क्योंकि वर्षा ऋतु में कालीमिर्च में नमी का स्तर बढ़ जाता है जिससे उसकी क्वालिटी प्रभावित हो सकती है।</p><p>इस वर्ष तमिलनाडु में कालीमिर्च का उत्पादन काफी घटकर 5000 टन से भी नीचे आ गया जबकि आमतौर पर वहां इसका उत्पादन 12-15 हजार टन के बीच होता रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पाद घटा है। लेकिन कर्नाटक में उत्पादन सामान्य होने के संकेत मिल रहे हैं। वहां अनेक उत्पादक अपनी कालीमिर्च का स्टॉक रोककर कॉफी की बिक्री बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं क्योंकि इसका भाव आकर्षक स्तर पर चल रहा है। अब धीरे-धीरे कालीमिर्च का स्टॉक भी बाजार में उतारा जाने लगा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32576</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:54:15 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[राजस्थान में 2025-26 सीजन की फसलों का तीसरा अग्रिम उत्पादन अनुमान जारी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-2025-26-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">जयपुर। देश के पश्चिमी प्रान्त- राजस्थान में कृषि विभाग ने 2025-26 सीजन के लिए विभिन्न फसलों के उत्पादन का तीसरा अग्रिम अनुमान जारी कर दिया है जिसमें खरीफ एवं रबी- दोनों सीजन का आंकड़ा शामिल है।&nbsp;</span></p><p>कृषि विभाग ने अपनी नई रिपोर्ट में 2024-25 के मुकाबले 2025-26 के मार्केटिंग सीजन में मूंगफली का उत्पादन करीब 47 प्रतिशत उछलकर 31.20 लाख टन तथा सरसों का उत्पादन 18 प्रतिशत बढ़कर 63 लाख टन के शीर्ष स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान लगाया है जबकि सोयाबीन का उत्पादन 52 प्रतिशत लुढ़ककर 5.95 लाख टन के करीब रह जाने की संभावना व्यक्त की है। उल्लेखनीय है कि राजस्थान देश में सरसों का सबसे बड़ा तथा मूंगफली का दूसरा सबसे प्रमुख उत्पादक प्रान्त है जबकि सोयाबीन के उत्पादन में वह तीसरे नंबर पर रहता है। पिछले साल जोरदार बारिश एवं भयंकर बाढ़ के कारण वहां सोयाबीन की फसल क्षतिग्रस्त हो गई।&nbsp;</p><p>कृषि विभाग की नवीनतम रिपोर्ट में 2025-26 सीजन के दौरान राजस्थान में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 297.70 लाख टन होने का अनुमान लगाया गया है जो 2024-25 सीजन के सकल उत्पादन 298.20 लाख टन से 50 हजार टन कम है। खाद्यान्न के संवर्ग में गेहूं, चावल, मोटे अनाज एवं दलहन शामिल हैं। समीक्षाधीन अवधि के दौरान राज्य में गेहूं का उत्पादन 6 प्रतिशत बढ़कर 158.90 लाख टन पर पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई है </p><p>मगर अन्य अधिकांश अनाजों&nbsp; का उत्पादन थोड़ा-बहुत घटने का अनुमान लगाया गया है। इसके तहत मक्का का उत्पादन 14 प्रतिशत घटकर 23.50 लाख टन, बाजरा का उत्पादन 10 प्रतिशत से ज्यादा गिरकर 48.10 लाख टन तथा चावल का उत्पादन 16 प्रतिशत घटकर 8.34 लाख टन रह जाने का अनुमान है जबकि जौ का उत्पादन 11 लाख टन होने की संभावना है।&nbsp;</p><p>दलहन फसलों में चना का उत्पादन 24 प्रतिशत उछलकर 24.50 लाख टन तथा मूंग का उत्पादन 13.80 लाख टन से सुधरकर 13.90 लाख टन पर पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। दूसरी ओर उड़द का उत्पादन 27 प्रतिशत घटकर 92 हजार टन पर अटक जाने की संभावना है। वैसे दलहनों का कुल उत्पादन 10 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 44.80 लाख टन पर पहुंचने की उम्मीद व्यक्त की गई है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32574</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 12:54:27 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीनी का वैश्विक उत्पादन उपयोग से कम होने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">न्यूयार्क। चीनी का वैश्विक उत्पादन 2026-27 के मार्केटिंग सीजन में घटने की संभावना है जबकि इसका उपयोग बढ़ने के आसार हैं। कमजोर बाजार भाव के कारण यूरोपीय संघ, ब्रिटेन एवं थाईलैंड में चीनी का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। इसी तरह विभिन्न कारणों से ब्राजील, भारत एवं ऑस्ट्रेलिया में भी चीनी का उत्पादन घट सकता है। इससे आपूर्ति में जटिलता बढ़ सकती है।&nbsp;</span></p><p>एक अग्रणी विश्लेषक फर्म के अनुसार 2025-26 के सीजन में चीनी का वैश्विक उत्पादन इसके संभावित उपयोग से करीब 22.90 लाख टन अधिक हुआ जिससे इसकी कीमतों पर दबाव बना रहा। इसके विपरीत 2026-27 के सीजन में उपयोग के मुकाबले चीनी का उत्पादन 5.50 लाख टन कम होने का अनुमान है। ऑस्ट्रेलिया, भारत एवं थाईलैंड में इस बार अल नीनो मौसम चक्र के प्रभाव से गन्ना की पैदावार पर असर पड़ने की संभावना है। </p><p>ब्राजील में चीनी के बजाए एथनॉल के निर्माण में गन्ना की अधिक मात्रा का उपयोग किया जाएगा। उधर यूरोपीय संघ एवं ब्रिटेन में किसान इस बार चुकंदर के बजाए कसावा की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं। मालूम हो कि वहां चुकंदर से चीनी का उत्पादन होता है।&nbsp;</p><p>विश्लेषक फर्म के मुताबिक यूरोपीय संघ एवं ब्रिटेन में चीनी का उत्पादन 12.5 प्रतिशत घटकर 153 लाख टन पर सिमटने का अनुमान है। इसी तरह थाईलैंड में उत्पादन 15 प्रतिशत की कमी के साथ 102 लाख टन पर अटक सकता है। चीनी का वैश्विक उत्पादन गिरकर 1937 लाख टन रहने तथा उपयोग बढ़कर 1943 लाख टन पर पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32572</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 12:07:14 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[दक्षिण-पश्चिम मानसून सप्ताहांत तक अंडमान में पहुंचने की संभावना]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून वर्तमान सप्ताह के अंत तक बंगाल की खाड़ी एवं अंडमान निकोबार द्वीप समूह के ऊपर पहुंच सकता है। यह इसके आने का परम्परागत रूप से सही समय है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिमी भाग के ऊपर एक कम दाब का क्षेत्र मौजूद है जो अगले 24 से 48 घंटे के अंदर काफी मजबूत हो सकता है और मानसून की प्रगति में सहायता कर सकता है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कुछ दिनों तक सक्रिय रहने के बाद मानसून आगे बढ़कर भारत की मुख्य भूमि में पहुंच जाएगा।&nbsp;</span></p><p>मौसम विभाग के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून के आने के लिए परिस्थितियां अनुकूल होती जा रही हैं और भारत में निश्चित समय के आसपास इसके सक्रिय हो जाने के आसार हैं। ऐसा लगता है कि जून में इसकी हालत कमोबेश सामान्य रहेगी और अल नीनो मौसम चक्र का इस पर सीमित या नगण्य असर पड़ेगा। बंगाल की खाड़ी के ऊपर निर्मित कम दाब का क्षेत्र एक साइक्लोनिक सर्कुलेशन के साथ जुड़ा हुआ है जो शीघ्र ही सक्रिय और गतिशील हो सकता है। यह सर्कुलेशन पानी से लदे मानसूनी बादल को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।&nbsp;</p><p>परम्परागत रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून 20 मई के आसपास अंडमान निकोबार द्वीप समूह में पहुंचता है और फिर पश्चिम दिशा की ओर बढ़कर भारत की मुख्य भूमि में आ जाता है। </p><p>केरल के सुदूर दक्षिणी छोर या कालीकट में यह 1 जून तक सर्वप्रथम भारतीय भूमि में आता है और फिर आगे बढ़कर देश के अन्य भागों में पहुंचता है। वैसे मौसम विभाग पहले ही चालू वर्ष में जून-सितम्बर के चार महीनों के दौरान मानसून की बारिश सामान्य औसत स्तर से कम होने की आशंका व्यक्त कर चुका है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32570</guid>				
                <pubDate>Wed, 13 May 2026 11:37:51 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[रूई के आयात पर निर्भरता खत्म करने हेतु घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरुरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">अहमदाबाद। भारत संसार में कपास (रूई) का अग्रणी उत्पादक देश है और यहां कम से कम 11 राज्यों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। इसमें गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं उड़ीसा शामिल है। केवल उड़ीसा को छोड़कर अन्य सभी राज्यों में बीटी कॉटन की खेती होती है।&nbsp;</span></p><p>भारत में कपास का बिजाई क्षेत्र दुनिया के अन्य किसी भी देश से ज्यादा रहता है मगर औसत उपज दर में भारत काफी पिछड़ा हुआ है इसलिए यहां रूई का उत्पादन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाता है। </p><p>केन्द्र सरकार ने 56 अरब 69 करोड़ रुपए की विशाल धनराशि के साथ महत्वकांक्षी कॉटन मिशन लांच किया है जिसके तहत खासकर रूई की औसत उपज दर एवं क्वालिटी सुधारने पर विशेष जोर दिया जाएगा। </p><p>यह योजना तो काफी अच्छी है और धनराशि भी पर्याप्त है लेकिन असली समस्या इस पर गम्भीरतापूर्वक अमल करने तथा इसे वास्तविक धरातल पर उतारने की होगी। कुछ अन्य मिशन की तरह यदि उसे भी आधी-अधूरी सफलता मिली तो उससे बात नहीं बनने वाली है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32544</guid>				
                <pubDate>Tue, 12 May 2026 19:42:48 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[गेहूं का स्टॉक पोजीशन बेहतर मगर क्वालिटी की समस्या कायम]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। विशाल पिछला बकाया स्टॉक एवं खरीद में हो रही प्रगति की बदौलत केन्द्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक बढ़कर न्यूनतम आवश्यक बफर मात्रा से काफी ऊपर पहुंच गया है लेकिन इसमें रियायती गुणवत्ता नियम के तहत खरीदे गए यूआरएस गेहूं की भारी-भरकम मात्रा भी शामिल है। इसकी बिक्री करने में सरकार को भारी कठिनाई हो सकती है। बदरंग, चमकहीन तथा टूटे-चिपटे दाने वाले गेहूं की आपूर्ति सार्वजनिक वितरण प्रणाली एवं अन्य कल्याणकारी&nbsp; योजनाओं के अंतर्गत करने पर सवाल और बवाल खड़े हो सकते हैं।&nbsp;</span></p><p>इस वर्ष पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में खरीदे गए गेहूं का अधिकांश भाग यूआरएस संवर्ग का है। इसकी जीवनावधि छोटी होती है और लम्बे समय तक इसका सुरक्षित भंडारण नहीं किया जा सकता है। </p><p>राज्यों को इस गेहूं का भंडार सामान्य क्वालिटी वाले गेहूं से अलग रखने के लिए कहा गया है। इसकी बिक्री भी सम्बन्धित राज्यों में ही करने का प्लान है लेकिन इसमें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां है। पंजाब में 121 लाख टन तथा हरियाणा में 80 लाख टन गेहूं यूआरएस श्रेणी का है जबकि वहां इतनी मात्रा में गेहूं की खपत होना मुश्किल है। राजस्थान में भी 13 लाख टन से ज्यादा यूआरएस संवर्ग का गेहूं खरीदा गया है।&nbsp;</p><p>हालांकि केन्द्रीय खाद्य सचिव ने पिछले दिनों कहा था कि फ्लोर मिलर्स एवं प्रोसेसर्स को सरकारी स्टॉक पर आश्रित रहने के बजाए खुली मंडियों में किसानों से अधिक से अधिक मात्रा में गेहूं की खरीद करके आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए </p><p>लेकिन साथ ही साथ उन्होंने यह भी कहा था कि जून में वास्तविक रूप से गेहूं की खरीद का सीजन समाप्त होने के बाद जुलाई में खुले बाजार बिक्री योजना (ओएमएसएस) के तहत सरकारी गेहूं बेचने के तौर-तरीकों का निर्धारण किया जा सकता है। </p><p>चूंकि इस बार केन्द्रीय पूल में यूआरएस गेहूं की मात्रा बहुत अधिक है इसलिए सरकार इसे जल्दी से जल्दी बेचने का प्रयास कर सकती है। इस पर उद्योग को गहरी नजर रखने की आवश्यकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32542</guid>				
                <pubDate>Tue, 12 May 2026 19:39:42 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[घरेलू एवं निर्यात मांग सीमित होने से जीरा का भाव नरम]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">राजकोट। घरेलू उत्पादन में गिरावट आने तथा गुजरात की बेंचमार्क ऊंझा मंडी में आपूर्ति कम होने के बावजूद जीरा की कीमतों में तेजी-मंदी का माहौल नहीं बन रहा है क्योंकि इसकी घरेलू एवं निर्यात मांग कमजोर है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">गुजरात एवं राजस्थान जैसे शीर्ष उत्पादक प्रांतों में फसल की कटाई-तैयारी अभी ठीक से समाप्त भी नहीं हुई है मगर कमजोर मंडी भाव को देखते हुए उत्पादकों ने इसका स्टॉक रोकना शुरू कर दिया है।&nbsp;</span></p><p>उल्लेखनीय है कि एक अग्रणी संस्था- फेडरेशन ऑफ इंडियन स्पाइस स्टैक होल्डर्स (फिस्स) ने चालू सीजन के दौरान जीरा के घरेलू उत्पादन में 15 प्रतिशत तथा गुजरात के व्यापारियों ने 25 प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान लगाया है। पिछला बकाया स्टॉक भी सीमित होने से जीरा के दाम में तेजी-मजबूती की उम्मीद की जा रही थी लेकिन बाजार कुछ सुस्त नजर आने लगा है।</p><p>चीन में बेहतर उत्पादन होने से उसके आयातक भारतीय जीरे की खरीद में बहुत कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं जबकि पहले वह इसका सबसे बड़ा खरीदार हुआ करता था। </p><p>तुर्की, ईरान, सीरिया एवं अफगानिस्तान जैसे देशों में जीरा के नए माल की आवक अगले कुछ सप्ताहों में शुरू होने वाली है जिससे वैश्विक बाजार में भारत के लिए चुनौती और भी बढ़ सकती है। बांग्ला देश थोड़ी-बहुत मात्रा में जीरा खरीद रहा है मगर अरब देशों में निर्यात लगभग ठप्प पड़ गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32540</guid>				
                <pubDate>Tue, 12 May 2026 17:50:27 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[फसल विविधिकरण के लिए वित्तीय सहायता की जरूरत पर जोर]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">हैदराबाद। दक्षिण भारत के एक महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक राज्य- तेलंगाना में खरीफ सीजन के दौरान मुख्यतः धान, मक्का एवं कपास का उत्पादन होता है और दलहन, तिलहन तथा अन्य मोटे अनाजों की खेती सीमित क्षेत्रफल में होती है राज्य सरकार अब धान का रकबा घटाकर दलहन तिलहन फसलों का क्षेत्रफल बढ़ाने हेतु फसल विविधिकरण योजना पर विशेष जोर दे रही है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">तेलंगाना किसान आयोग ने भी राज्य सरकार को इस योजना का विकास-विस्तार करने के लिए कहा है। आयोग ने इसमें दलहनों एवं तिलहनों के साथ सब्जियों की फसल को भी शामिल करने का सुझाव दिया है ताकि एकल फसलीय कृषि प्रणाली से किसानों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। इसके अलावा आयोग ने राज्य में हल्दी और गन्ना जैसी परम्परागत फसलों की खेती को भी प्रोत्साहित करने की जरूरत पर जोर दिया है।</span></p><p>सरकार को सौंपे अपनी 40 पेज की रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि सभी वैकल्पिक फसलों के लिए मूल्य समर्थन एवं बीमा कवर का प्रबंध होना आवश्यक है तभी किसानों का उत्साह एवं आकर्षण इन फसलों की तरफ बढ़ सकता है। तेलंगाना को फसलों की अदला बदली (विविधिकरण) योजना की सख्त आवश्यकता है क्योंकि वहां धान-चावल की खरीद के मुद्दे पर अक्सर केन्द्र के साथ विवाद बना रहता है। </p><p>इसी तरह रूई का खुला बाजार भाव भी सरकारी समर्थन मूल्य से काफी नीचे रहने के कारण केन्द्रीय एजेंसी- भारतीय कपास निगम (सीसीआई) को किसानों से विशाल मात्रा में इसकी खरीद करनी पड़ती है। सरकार को मक्का की भारी खरीद के लिए भी विवश होना पड़ता है।</p><p>तेलंगाना में पहले गन्ना का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता था मगर अब उसके क्षेत्रफल का दायरा सिमटता जा रहा है। वहां हल्दी के उत्पादन के प्रति भी किसानों की दिलचस्पी घटती जा रही है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 17:20:10 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कम स्टॉक एवं मजबूत मांग से कर्नाटक में चावल का भाव तेज]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मैसूर। पिछला बकाया स्टॉक कम रहने, निर्यात प्रदर्शन बेहतर होने तथा उपभोक्ता मांग में वृद्धि होने से कर्नाटक की मंडियों में खासकर 'ए' ग्रेड चावल का भाव औसतन करीब 10 प्रतिशत बढ़ गया है। कर्नाटक से इस बार विदेशों में अच्छी खासी मात्रा में चावल का निर्यात किया गया।&nbsp;</span></p><p>प्रीमियम क्वालिटी के बासमती चावल तथा जीरा चावल के दाम में अधिक बढ़ोत्तरी हुई है। प्राप्त सूचना के अनुसार बासमती चावल का औसत मूल्य 90 रुपए से बढ़कर 115 रुपए प्रति किलो और जीरा चावल का भाव 180 रुपए से उछलकर 220 रुपए प्रति किलो के शीर्ष स्तर पर पहुंच गया है। इसके साथ-साथ सामान्य श्रेणी के चावल के दाम में भी बढ़ोत्तरी हुई है। इसके अंतर्गत सोना मसूरी चावल का मूल्य 40 रुपए से सुधरकर 45 रुपए प्रति किलो तथा बुलेट चावल का भाव 65 रुपए से बढ़कर 75 रुपए प्रति किलो हो गया है।&nbsp;</p><p>व्यापार विश्लेषकों के अनुसार मांग तथा आपूर्ति के बीच बनने वाले समीकरण के आधार पर चावल की कीमतों में अगैती उतार-चढ़ाव का सिलसिला जारी रह सकता है। धारणा मजबूती की बनी रहेगी। हालांकि हाल के वर्षों में कर्नाटक में गेहूं उत्पादों से निर्मित खाद्य पदार्थों की खपत में वृद्धि हुई है मगर फिर भी चावल अधिकांश लोगों का मुख्य खाद्य आहार है और वहां इसका अच्छा उत्पादन भी होता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32536</guid>				
                <pubDate>Tue, 12 May 2026 16:52:14 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[ग्रीष्मकालीन फसलों का बिजाई क्षेत्र 83 लाख हेक्टेयर के पार]]></title>
                <link><![CDATA[https://igrain.in/posts/-83-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि ग्रीष्मकालीन या जायद सीजन की फसलों का कुल उत्पादन बढ़कर इस बार 83.08 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है जो पिछले साल की इसी अवधि के बिजाई क्षेत्र 80.01 लाख हेक्टेयर से 3.07 लाख हेक्टेयर ज्यादा है। यह रकबा पंचवर्षीय औसत क्षेत्रफल 75.37 लाख हेक्टेयर से भी काफी अधिक है। गत वर्ष जायद फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र 83.92 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा था।&nbsp;</span></p><p>आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले साल की तुलना में मौजूदा जायद सीजन के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर धान का उत्पादन क्षेत्र तो 32.42 लाख हेक्येटर से घटकर 31.05 लाख हेक्टेयर रह गया लेकिन दलहन फसलों का बिजाई क्षेत्र 23.76 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 24.97 लाख हेक्टेयर, तिलहनों का क्षेत्रफल 9.58 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 11.04 लाख हेक्टेयर तथा मोटे अनाजों का रकबा 14.25 लाख हेक्टेयर से उछलकर 16.01 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया।</p><p>दलहन फसलों में मूंग का बिजाई क्षेत्र 20 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 20.07 लाख हेक्टेयर तथा उड़द का क्षेत्रफल 3.58 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.60 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा। अन्य दलहनों का रकबा भी 19 हजार हेक्टेयर से सुधरकर 30 हजार हेक्टेयर पर पहुंच गया।&nbsp;</p><p>इसी तरह तिलहन फसलों के संवर्ग में मूंगफली का उत्पादन क्षेत्र 4.20 लाख हेक्टेयर से उछलकर 5.51 लाख हेक्टेयर, तिल का बिजाई क्षेत्र 4.96 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 5.07 लाख हेक्टेयर तथा सूरजमुखी का क्षेत्रफल 35 हजार हेक्टेयर से सुधरकर 39 हजार हेक्टेयर हो गया।&nbsp;</p><p>जहां तक मोटे अनाजों का सवाल है तो इस संवर्ग में ज्वार का रकबा 36 हजार हेक्टेयर पर स्थिर रहा मगर बाजरा का बिजाई क्षेत्र 5.20 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 5.40 लाख हेक्टेयर, मक्का का उत्पादन क्षेत्र 8.50 लाख हेक्टेयर से उछलकर 10 लाख हेक्टेयर तथा रागी का रकबा 16 हजार हेक्टेयर से सुधरकर 22 हजार हेक्टेयर पर पहुंच गया। जायद फसलों की बिजाई बिल्कुल अंतिम चरण में पहुंच गई है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/32534</guid>				
                <pubDate>Tue, 12 May 2026 16:48:56 +0530</pubDate>
            </item>
                
    </channel>

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