भारत का गेहूं सेक्टर बहुस्तरीय दबाव में, खरीद सीजन से पहले बढ़ी चिंता

28-Mar-2026 10:18 AM

भारत का गेहूं सेक्टर बहुस्तरीय दबाव में, खरीद सीजन से पहले बढ़ी चिंता
★ भारत का गेहूं बाजार इस समय एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है, जहां एक तरफ उत्पादन और उपलब्धता मजबूत है, वहीं दूसरी तरफ लॉजिस्टिक, नीतिगत और वित्तीय चुनौतियां स्थिति को जटिल बना रही हैं।
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रिकॉर्ड सप्लाई और बढ़ते स्टॉक से दबाव
★ इस सीजन में सप्लाई की स्थिति बेहद मजबूत है। 1 मार्च तक केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 236.22 लाख टन रहा, जो पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक है—2025 में 134.06 लाख टन, 2024 में 96.92 लाख टन और 2023 में 116.70 लाख टन। यह पिछले चार वर्षों का उच्चतम स्तर है।
★ इसके साथ ही इस बार रिकॉर्ड उत्पादन की उम्मीद है, जिसे अनुकूल मौसम का समर्थन मिला है। आमतौर पर जहां लगभग 10% फसल मौसम की वजह से प्रभावित होती है, इस साल नुकसान केवल 5–8% तक सीमित रहने का अनुमान है। पिछले साल की तुलना में इस बार तापमान भी अपेक्षाकृत कम है, जिससे उत्पादकता बढ़ने की संभावना है।
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खरीद तैयारियों पर सवाल
★ उत्पादन बढ़ने के बावजूद सरकारी खरीद लक्ष्य में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं की गई है, जिससे अतिरिक्त उत्पादन के समुचित प्रबंधन पर सवाल उठ रहे हैं।
★ हालांकि 1 अप्रैल से पंजाब, हरियाणा सहित प्रमुख राज्यों में खरीद शुरू होनी है, लेकिन तैयारियां पर्याप्त नहीं दिख रही हैं। सबसे बड़ी समस्या गन्नी बैग (जूट बैग) की कमी है, जो खरीद प्रक्रिया के लिए जरूरी हैं।
★ कई राज्यों ने नए और पुराने गन्नी बैग के लिए टेंडर जारी किए हैं, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण कई टेंडर रद्द या लंबित हैं। प्लास्टिक बैग का विकल्प भी महंगा साबित हो रहा है, क्योंकि क्रूड ऑयल महंगा होने से प्लास्टिक कच्चे माल (दाना) की कीमतें ऊंची हैं और उपलब्धता भी सीमित है।
★ चूंकि टेंडर प्रक्रिया अभी जारी है, ऐसे में समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, खासकर जब गेहूं की आवक अप्रैल के अंतिम सप्ताह से मई के अंत तक चरम पर होती है।
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किसानों को कम कीमत पर बिक्री का खतरा
★ यदि खरीद व्यवस्था समय पर मजबूत नहीं हो पाती है, तो किसानों को एमएसपी से नीचे कीमत पर गेहूं बेचना पड़ सकता है। इससे खासकर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में असंतोष बढ़ सकता है, जहां सरकारी खरीद पर किसानों की निर्भरता अधिक है।
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राजनीतिक असर की आशंका
★ हालांकि आगामी चुनाव असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी जैसे गैर-गेहूं उत्पादक राज्यों में हैं, फिर भी यदि प्रमुख उत्पादक राज्यों के किसानों को नुकसान होता है, तो इसका असर सरकार की छवि पर पड़ सकता है।
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एफसीआई पर वित्तीय दबाव और कमजोर उठाव
★ Food Corporation of India (एफसीआई) की वित्तीय स्थिति भी दबाव में है।
★ ओएमएसएस (ओपन मार्केट सेल स्कीम) के तहत गेहूं की बिक्री सीमित रही है, जबकि चावल का उठाव भी कमजोर है। सरकार चावल को लगभग ₹30/kg पर खरीद रही है, लेकिन लगभग ₹22.5/kg पर बेचने के बावजूद मांग कम है। इससे बाजार में कमजोर खपत और सरकारी एजेंसियों पर वित्तीय दबाव का संकेत मिलता है।
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वैश्विक बाजार और निर्यात सीमाएं
★ अंतरराष्ट्रीय गेहूं कीमतें भारतीय एफओबी कीमतों से नीचे हैं, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं रह गया है। हाल के भू-राजनीतिक तनाव से कीमतों में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन स्थिति सामान्य होने पर अंतर फिर बढ़ सकता है।
★ सरकार द्वारा 25 लाख टन गेहूं निर्यात की अनुमति दी गई है, जो कुल उत्पादन के मुकाबले काफी कम है और घरेलू अतिरिक्त सप्लाई को कम करने में सीमित भूमिका निभाएगा।
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राजकोषीय दबाव भी चुनौती
★ हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती से सरकारी राजस्व पर असर पड़ सकता है, जिससे गेहूं सेक्टर को अतिरिक्त समर्थन देने की क्षमता सीमित हो सकती है।
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आगे का दृष्टिकोण
★ भारत का गेहूं सेक्टर इस समय “अधिक उत्पादन लेकिन सीमित प्रबंधन क्षमता” की स्थिति में फंसा हुआ है। आने वाले कुछ सप्ताह, खासकर पीक आवक के दौरान, यह तय करेंगे कि व्यवस्था इस अतिरिक्त सप्लाई को संभाल पाती है या बाजार में अस्थिरता और किसानों की परेशानी बढ़ती है।

महत्वपूर्ण सूचना:
उपरोक्त रिपोर्ट केवल जानकारी के लिए है। आई-ग्रेन इंडिया किसी भी प्रकार के लाभ या हानि की जिम्मेदारी नहीं लेता और न ही बाजार में किसी विशेष दिशा (तेजी या मंदी) का समर्थन करता है। कृपया कोई भी निर्णय अपने विवेक और समझदारी से लें।