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24-Oct-2026 10:42 AM
विषुवतीय प्रशांत महासागर से उत्पन्न अल नीनो मौसम चक्र लगातार मजबूत एवं शक्तिशाली होता जा रहा है जिसके प्रभाव से भारत में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन कुछ कमजोर पड़ने की आशंका है। अल नीनो का असर खरीफ सीजन की फसलों पर पहले से ही देखा जा रहा है और आगे रबी फसलों पर भी इसकी काली छाया पड़ने की आशंका है।
यद्यपि फिलहाल उत्तर-पूर्व मानसून सक्रिय है लेकिन इसका दायरा दक्षिण एवं पूर्वी भारत तक सीमित रहता है। देश के अन्य भागों में शीतकरण के दौरान काफी कम बारिश होती है जबकि इस बार वर्षा की कमी ज्यादा अखर सकती है क्योंकि ग्रीष्मकालीन वर्षा संतोषजनक नहीं हुई। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक राज्य भयंकर सूखे की चपेट में फंसे हुए हैं जबकि कई अन्य प्रांतों में भी वर्षा का वितरण असामान्य रहा है।
मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि 1 से 21 अक्टूबर के बीच देश के 734 जिलों में से करीब 75 प्रतिशत जिलों में वर्षा नहीं या नगण्य हुई जबकि इस अवधि की बारिश रबी फसलों की बिजाई के लिए मजबूत आधार प्रदान करती है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख बांधों-जलाशयों में भी पानी का स्टॉक महज 67 प्रतिशत है जो गत वर्ष की तुलना में बहुत कम है। 4 जून से 15 अक्टूबर के दौरान देश में सामान्य औसत से 15 प्रतिशत कम बारिश हुई।
रबी फसलों की बिजाई तो आरंभ हो चुकी है मगर फिलहाल इसकी गति धीमी देखी जा रही है जो चिंता का विषय है। आगामी सप्ताहों के दौरान बिजाई की रफ्तार तेज होने के आसार हैं लेकिन अल नीनो के प्रभाव से यदि बारिश में बाधा पड़ी तो फसलों की प्रगति पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। रबी सीजन में खासकर गेहूं, जौ, चना, मसूर, मटर एवं सरसों का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।
सरकार के पास गेहूं का तो अच्छा खासा स्टॉक मौजूद है मगर दलहन-तिलहन का स्टॉक बहुत कम है। विदेशों से दलहनों एवं खाद्य तेलों का विशाल आयात आगामी महीनों में भी जारी रहने की संभावना है। बाजार में तेजी-मजबूती का माहौल कायम रह सकता है।