News Capsule/न्यूज कैप्सूल: चीनी कीमतों पर राजनीति तेज, आयात से एथेनॉल नीति पर बहस
24-Aug-2026 12:04 PM
News Capsule/न्यूज कैप्सूल: चीनी कीमतों पर राजनीति तेज, आयात से एथेनॉल नीति पर बहस
★ केंद्र सरकार द्वारा करीब 10 साल के अंतराल के बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दिए जाने से चीनी की कीमतों, एथेनॉल उत्पादन और निर्यात नीति को लेकर राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और उद्योग के बीच बहस तेज हो गई है। सरकार ने घरेलू बाजार में बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने और त्योहारी सीजन में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है।
★ चीनी भारत में राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिंस है, क्योंकि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में इसका व्यापक प्रभाव है। अगले आठ महीनों में पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिससे चीनी आयात का फैसला राजनीतिक रूप भी ले चुका है।
★ विपक्ष ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष ने कहा कि जब देश में चीनी उत्पादन घट रहा है, स्टॉक नौ साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है और सरकार को 10 लाख टन चीनी आयात करनी पड़ रही है, तो गन्ने और अनाज से एथेनॉल उत्पादन तथा पेट्रोल में E20 मिश्रण की नीति की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही है।
★ चीनी की कीमतों और गन्ने को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। पार्टी का आरोप है कि एथेनॉल मिश्रण और चीनी की ऊंची कीमतों का फायदा कुछ लोगों को मिल रहा है।
★ सरकार ने हालांकि चीनी की मौजूदा महंगाई के लिए एथेनॉल डायवर्जन को जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। सरकार के अनुसार, एथेनॉल के लिए डायवर्ट की जाने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 में 12% से घटकर 2025-26 में 9% रह गई है। साथ ही, देश में उत्पादित एथेनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का, से बनता है।
★ सरकार के मुताबिक चीनी कीमतों में मौजूदा तेजी कई कारणों का परिणाम है। इनमें उम्मीद से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारी सीजन से पहले बढ़ी मांग, मौसम से गन्ने की फसल को नुकसान, वैश्विक चीनी आपूर्ति में कमी तथा कुछ उद्योग वर्गों द्वारा जमाखोरी और सट्टेबाजी शामिल हैं।
★ सरकार का कहना है कि अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने से चीनी उद्योग की संरचनात्मक समस्या को दूर करने और मिलों की वित्तीय स्थिति सुधारने में मदद मिली है। 20 अगस्त तक 2025-26 चीनी सीजन के गन्ना बकाये का 97% किसानों को भुगतान किया जा चुका था।
★ सरकार ने यह भी कहा कि चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति सुधरने से सरकारी सहायता पर उनकी निर्भरता कम हुई है। 2014 से 2021 के बीच चीनी उद्योग को करीब ₹14,600 करोड़ की सब्सिडी दी गई थी, जबकि 2021-22 के बाद ऐसी कोई नई सब्सिडी घोषित नहीं की गई है।
★ हालांकि, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार के लिए चीनी कीमतों को बहुत नीचे लाना आसान नहीं होगा। अधिक आयात या एथेनॉल के लिए चीनी डायवर्जन में बड़ी कटौती से मिलों की वित्तीय स्थिति प्रभावित हो सकती है और अक्टूबर से शुरू होने वाले 2026-27 सीजन में गन्ना बकाया बढ़ने का जोखिम पैदा हो सकता है।
★ उद्योग के अनुसार, करीब ₹50 प्रति किलोग्राम की चीनी कीमत मिलों के लिए सकारात्मक होगी। उत्पादन लागत लगभग ₹42-43 प्रति किलोग्राम आंकी जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में कई मिलों को उत्पादन लागत से नीचे चीनी बेचनी पड़ी, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव रहा। इसलिए लंबे समय तक करीब ₹50 प्रति किलोग्राम के एक्स-मिल भाव मिलों की वित्तीय स्थिति सुधारने में मदद कर सकते हैं।
