कमजोर मानसून का संभावित असर

27-Jun-2026 11:00 AM

इस वास्तविकता के स्पष्ट संकेत मिलने लगे हैं कि इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव से दक्षिण-पश्चिम मानसून काफी कमजोर रहेगा और देश के कई भागों में बारिश की स्थिति अनिश्चित एवं अनियमित बनी रहेगी। जून का महीना काफी हद तक सूखा रहा। 25 जून तक राष्ट्रीय स्तर पर दीर्घकालीन औसत के मुकाबले 42 प्रतिशत कम बारिश हुई।

अब मानसून की सक्रियता एवं रफ्तार कुछ दिनों के लिए बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है लेकिन उसके बाद उसमें ठहराव आ सकता है। मौसम विभाग ने जून-सितम्बर 2026 के चार महीनों में दीर्घकालीन औसत (एलपीए) के सापेक्ष 90 प्रतिशत बारिश होने की संभावना व्यक्त की है जबकि एक प्राइवेट मौसम एजेंसी ने केवल 84.95 प्रतिशत वर्षा होने का अनुमान लगाया है।

भारतीय कृषि क्षेत्र और सम्पूर्ण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की प्रगति के दृष्टिकोण से मानसून की कमजोर वर्षा को निराशाजनक माना जा सकता है क्योंकि इससे न केवल विभिन्न कृषि फसलों तथा बागानी एवं बागवानी फसलों का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है जिससे किसानों की आमदनी में कमी आएगी बल्कि कृषि पर आधारित उद्योगों तथा तेजी से उभरते उपभोक्ता उत्पादों (एफएमसीजी) की कंपनियों के लिए भी खतरा बढ़ जाएगा। 

सरकारी गोदामों में चावल और गेहूं का भरपूर स्टॉक मौजूद है और कुछ हद तक दलहनों का स्टॉक भी संतोषजनक माना जा सकता है इसलिए तत्काल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए कोई खतरा नजर नहीं आता है लेकिन यदि दलहन, तिलहन, गन्ना एवं कपास सहित अन्य खरीफ फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ तो देश में संकट उत्पन्न हो सकता है।

प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देशों का ध्यान भारत पर ही केन्द्रित है और यदि यहां आयात बढ़ने का संकेत मिला तो निर्यातक देश अपने उत्पादों का दाम बढ़ाने से बाज नहीं आएंगे। खरीफ फसलों की बिजाई गत वर्ष से पीछे चल रही है जो गंभीर चिंता का विषय है।