WPPS CEO कॉन्क्लेव 2026: गेहूं, एथेनॉल और सरकारी नीतियों पर उद्योग की स्पष्ट राय

11-Jul-2026 12:47 PM

WPPS CEO कॉन्क्लेव 2026: गेहूं, एथेनॉल और सरकारी नीतियों पर उद्योग की स्पष्ट राय
★ वाराणसी में 9 एवं 10 जुलाई 2026 को आयोजित WPPS CEO कॉन्क्लेव 2026 में देशभर से 400 से अधिक उद्योग प्रतिनिधियों, रोलर फ्लोर मिलर्स, प्रोसेसर्स, ट्रेडर्स, एथेनॉल उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों तथा कृषि क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों ने भाग लिया। इस महत्वपूर्ण आयोजन में आई-ग्रेन इंडिया मीडिया पार्टनर रहा और पूरे कार्यक्रम की प्रमुख गतिविधियों को कवर किया।
★ दो दिवसीय कॉन्क्लेव में एथेनॉल नीति, गेहूं बाजार, खाद्य सुरक्षा, सरकारी हस्तक्षेप, वैश्विक बाजार और आगामी सीजन की संभावनाओं पर व्यापक चर्चा हुई। प्रतिभागियों के प्रमुख निष्कर्ष निम्नलिखित रहे:
★ भारत की एथेनॉल निर्माण नीति ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। इससे पेट्रोलियम ईंधन पर निर्भरता घट रही है और देश के विदेशी मुद्रा भंडार की भी बचत हो रही है। हालांकि, इस नीति ने केवल चीनी उद्योग ही नहीं बल्कि गेहूं, मक्का, चावल, खाद्य तेल, कपास तथा पशु आहार उद्योग की कारोबारी संरचना को भी बदल दिया है।
★ एथेनॉल उत्पादन के साथ निकलने वाले DDGS की उपलब्धता बढ़ने से पशु आहार उद्योग में चोकर की मांग पहले की तुलना में कमजोर हुई है, जिससे इस क्षेत्र के व्यापारिक समीकरण भी बदल रहे हैं।
★ वर्तमान समय में गेहूं बाजार का रुख लगभग पूरी तरह सरकारी नीतियों से तय हो रहा है। सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में गेहूं एवं अन्य खाद्यान्न का स्टॉक उपलब्ध है, जिससे पूरे विपणन वर्ष में आपूर्ति की कोई बड़ी समस्या दिखाई नहीं देती।
★ सरकार उत्पादन, केंद्रीय पूल स्टॉक तथा निजी क्षेत्र के उपलब्ध भंडार के सटीक आंकड़ों से अवगत रहती है। ऐसे में यदि खरीद, बिक्री, ओएमएसएस, स्टॉक सीमा अथवा अन्य नीतिगत निर्णय पहले से घोषित किए जाएं तो उद्योग बेहतर व्यावसायिक योजना बना सकता है।
★ बाजार में बार-बार होने वाले सरकारी हस्तक्षेप से अनिश्चितता बढ़ती है और सामान्य व्यापार प्रभावित होता है। इसलिए नीतियों में स्थिरता और निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है। स्पष्ट एवं पूर्व घोषित नीति ढांचा उद्योग और किसानों दोनों के लिए लाभदायक रहेगा।
★ न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में लगातार वृद्धि का प्रभाव अंततः खुले बाजार की कीमतों पर भी दिखाई देता है। इसलिए लंबे समय में गेहूं की कीमतों को स्वाभाविक समर्थन मिलने की संभावना बनी रहती है।
★ केवल एल नीनो की घोषणा का अर्थ कमजोर मानसून नहीं होता। पिछले कुछ दिनों में देश के अधिकांश हिस्सों में अच्छी वर्षा हुई है। साथ ही भारतीय महासागर में बढ़ता इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) तापमान अगस्त के बाद बेहतर वर्षा की संभावना का संकेत देता है। सरकार भी एल नीनो की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।
★ हाल के वर्षों में सरकार द्वारा की गई अधिक खरीद (Procurement) से देश की खाद्य सुरक्षा काफी मजबूत हुई है। सरकारी भंडार पर्याप्त होने के कारण मौजूदा सीजन में गेहूं की उपलब्धता को लेकर किसी बड़े संकट की संभावना नहीं दिखाई देती।
★ पिछले लगभग पांच वर्षों में लगातार बदलती सरकारी नीतियों के कारण गेहूं व्यापार करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। उद्योग को अब पहले की तुलना में अधिक नीतिगत जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।
★ वैश्विक स्तर पर गेहूं का उत्पादन और उपलब्धता फिलहाल संतोषजनक मानी जा रही है। जानकारी साझा की गई कि पिछले लगभग 15 दिनों में रूस के गेहूं का FOB निर्यात मूल्य लगभग 250 डॉलर प्रति टन से घटकर 225 डॉलर प्रति टन रह गया है, जो वैश्विक आपूर्ति की सहज स्थिति को दर्शाता है।
★ कॉन्क्लेव का निष्कर्ष रहा कि निकट भविष्य में गेहूं वायदा एवं हाजिर बाजार की दिशा मुख्य रूप से सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगी। इसके बावजूद अधिकांश मिलर्स और व्यापारियों ने आने वाले समय में गेहूं की कीमतों को लेकर तेजी का रुख व्यक्त किया, हालांकि यह तेजी काफी हद तक भविष्य की सरकारी नीतियों पर निर्भर रहेगी।