दाल-दलहनों की समुचित आपूर्ति की बढ़ सकती है चुनौती

29-Jul-2026 07:35 PM

नई दिल्ली। खरीफ कालीन दलहन फसलों का उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष से काफी पीछे चल रहा है। इसके तहत खासकर अरहर (तुवर) मूंग एवं मोठ के रकबे में गिरावट आई है जबकि उड़द के बिजाई क्षेत्र में बढ़ोत्तरी हुई है। इस वर्ष 24  जुलाई तक दलहनों का कुल उत्पादन क्षेत्र 84.57 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा जो गत वर्ष की समान अवधि के बिजाई क्षेत्र 91.46 लाख हेक्टेयर से 6.89 लाख हेक्टेयर कम रहा। इससे पूर्ववर्ती सप्ताह में दलहनों का क्षेत्रफल 69 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा था जो पिछले साल के रकबा 81 लाख हेक्टेयर से 12 लाख हेक्टेयर कम था। यद्यपि दलहन फसलों की बिजाई में कुछ प्रगति हुई है लेकिन इसका उत्पादन के प्रति चिंता अभी बरकरार है। उत्पादन घटने से आयात पर निर्भरता बढ़ेगी और तदनुरूप कीमतों में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है। 

उद्योग समीक्षकों एवं व्यापार विश्लेषकों का कहना है कि बिजाई क्षेत्र में आने वाली गिरावट का दलहनों के उत्पादन पर कितना और कैसा असर पड़ेगा इसका अनुमान लगाना अभी जल्दबाजी होगी। दलहन फसलों की बिजाई का अभियान अभी समाप्त नहीं हुआ है और फिलहाल मौसम तथा मानसून की हालत भी अनुकूल बनी हुई है।

24 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार अरहर का उत्पादन क्षेत्र 35.27 लाख हेक्टेयर से लुढ़ककर 31.17 लाख हेक्टेयर, मोठ का बिजाई क्षेत्र 7.68 लाख हेक्टेयर 5.08 लाख हेक्टेयर और मूंग का क्षेत्रफल 28.39 लाख हेक्टेयर से गिरकर 26.89 लाख हेक्टेयर रह गया जबकि उड़द का रकबा 17.27 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 18.67 लाख हेक्टयर पर पहुंच गया। कुलथी का रकबा  भी बढ़ा है जबकि अन्य दलहनों का बिजाई क्षेत्र कुछ घटा है।

मानसून की वर्षा अब भी दीर्घकालीन औसत से 16 प्रतिशत पीछे है जबकि मौसम विभाग ने अगस्त-सितम्बर में भी सामान्य औसत से कम वर्षा होने की संभावना व्यक्त की है। इससे दलहन फसलों की प्रगति उपज दर एवं पैदावार प्रभावित हो सकती है।

भारत दुनिया में दलहनों का सबसे प्रमुख उत्पादक देश है लेकिन फिर भी वहां विशाल मात्रा में विदेशों से इसके आयात की आवश्यकता बनी रहती है क्योंकि कुल उत्पादन घरेलू मांग एवं जरूरत से कम होती है। भारत में सिर्फ मूंग को छोड़कर अन्य लगभग अधिकांश प्रमुख दलहनों का विशाल आयात किया जाता है जिसमें अरहर, उड़द, चना, मसूर, राजमा एवं लोबिया आदि शामिल है।