व्यापार समझौता का यथार्थ

07-Feb-2026 11:50 AM

भारत और अमरीका के बीच बहु प्रतीक्षित द्विपक्षीय व्यापार समझौता होना दोनों देशों के हित में है और इसलिए इसे सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाना आवश्यक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब भी द्विपक्षीय व्यापारिक संधि होती है तो दोनों पक्ष उससे अधिक से अधिक लाभ हासिल करने की मंशा रखते है। 

मौजूदा संधि भी इसका अपवाद नहीं है। भारत सरकार जोर देकर कह रही है कि इस संधि में भारतीय किसानों एवं डेयरी उत्पादों के हितों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। इस दावे पर भरोसा किया जा सकता है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अमरीका भारत को एक पक्षीय लाभ सुनिश्चित करने के लिए इस संधि पर सहमत हुआ है ? अमरीका अपने हितों की कुर्बानी नहीं दे सकता यह सर्वज्ञात तथ्य है।

इसका मतलब यह है कि उसे भी भारत की ओर से कई रियायतें दी गई हैं जिसका खुलासा होना अभी बाकी है। इस बीच यह सूचना आ रही है कि रूस से खनिज तेल एवं हथियार खरीदने के बहाने अमरीका ने भारतीय उत्पादों पर जो 25 प्रतिशत का अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ लागू किया था उसकी वसूली रोक दी गई है।

अमरीका भारतीय उत्पादों पर मूल्य आयात शुल्क के पहले ही 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत नियत करने की घोषणा कर चुका है। इससे प्रतीत होता है कि अमरीका में भारतीय उत्पादों पर अब केवल 18 प्रतिशत का सीमा शुल्क वैध होगा।

भारत सरकार दावा कर रही है कि इस द्विपक्षीय व्यापार संधि से भारतीय उत्पादों के लिए अमरीका में बाजार का विस्तार होगा। इसका यथार्थ समझना आवश्यक है।

यह तुलना अगस्त 2025 के बाद की अवधि के लिए तो तर्क संगत है लेकिन इसके पूर्व की अवधि के सापेक्ष सही नहीं लगती है।

अमरीका ने भारतीय उत्पादों पर 20 अगस्त को 25 प्रतिशत तथा 27 अगस्त को 50 प्रतिशत टैरिफ लागू किया था जबकि उससे पहले इस पर आयात शुल्क की दर बहुत कम थी।

इसका मतलब यह हुआ कि अगस्त 2025 के मुकाबले अब अमरीका में भारतोय उत्पादों पर कम टैक्स लगेगा मगर जुलाई 2025 की तुलना में टैक्स ऊंचा रहेगा।

भारत के लिए एक प्लस प्वाइंट यह है कि इसके प्रतिद्वंदी अपूर्तिकर्ता देशों के उत्पादों पर अपेक्षाकृत कुछ ऊंचा शुल्क लगेगा। इससे चावल, मसाले, वस्त्र उत्पाद एवं काजू आदि के निर्यातकों को थोड़ी राहत मिलेगी।

अगले कुछ दिनोंं में समझौते का दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने की संभावना है और तब हकीकत सामने आ जाएगी।