दलहन-तिलहन फसलों के क्षेत्रफल में गिरावट आना चिंता का विषय
26-Dec-2024 01:00 PM
नई दिल्ली । केन्द्र सरकार ने वर्ष 2027 के अंत तक दलहनों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य रखा है और अगले पांच वर्षों में तिलहनों की पैदावार बढ़ाकर खाद्य तेलों के आयात को न्यूनतम स्तर पर लाने का प्लान बनाया है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों एवं परिदृश्य से संकेत मिलता है कि नियत समयावधि में लक्ष्य को हासिल करना बहुत कठिन होगा।
बेशक खरीफ सीजन में दलहन-तिलहन फसलों के कुल उत्पादन क्षेत्र में अच्छी बढ़ोत्तरी हुई थी और खासकर तुवर, मूंग, सोयाबीन एवं मूंगफली का रकबा बढ़ा था लेकिन वर्तमान रबी सीजन में मसूर-मटर एवं सरसों-मूंगफली के क्षेत्रफल में गिरावट आ गयी है। केवल चना का बिजाई क्षेत्र गत वर्ष से आगे चल रहा है।
सोयाबीन का थोक मंडी भाव सरकारी समर्थन मूल्य से काफी नीचे चल रहा है और इसकी खरीद की गति भी धीमी होने से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।
यदि यही हाल रहा तो आगामी खरीफ सीजन में किसान सोयाबीन की खेती से हतोत्साहित हो सकते हैं। मूंगफली उत्पादकों को भी समर्थन मूल्य प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ रहा है।
चालू रबी सीजन में किसान दलहन-तिलहन फसलों के बजाए गेहूं की खेती को विशेष प्राथमिकता दे रहे हैं जिससे उसके क्षेत्रफल में अच्छी बढ़ोत्तरी हो रही है।
देश में विदेशों से दलहनों एवं खाद्य तेलों का विशाल आयात हो रहा है जिस पर भारी-भरकम बहुमूल्य विदेशों मुद्रा खर्च हो रही है और राजकोष पर जबरदस्त दबाव पड़ रहा है।
सरकार इस गंभीर संकट को दूर करने का भरसक प्रयास कर रही है मगर किसानों को समुचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। सरसों के बिजाई क्षेत्र में गिरावट आना विशेष रूप से चिंता का विषय है।
इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किए जाने की जरूरत है। रबी फसलों की बिजाई अभी जारी है मगर दलहन-तिलहन फसलों की खेती के प्रति किसानों में उत्साह एवं आकर्षण घट रहा है।
