दलहनों एवं खाद्य तेलों पर आयात शुल्क तर्क संगत होना जरुरी
27-Nov-2025 08:49 PM
नई दिल्ली। भारत दुनिया में दाल-दलहन का सबसे प्रमुख उत्पादक, खपतकर्ता एवं आयातक देश बना हुआ है जबकि यह तिलहन-तेल के मामले में भी संसार की पांचवी सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था वाला देश है।
लेकिन दलहन-तिलहन का घरेलू उत्पादन दालों एवं खाद्य तेलों की घरेलू मांग एवं जरूरत से काफी कम हो रहा है जिससे भारत दलहनों एवं खाद्य तेलों का सबसे प्रमुख आयातक देश बना हुआ है।
हालांकि केन्द्र सरकार दलहन-तिलहन फसलों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए गंभीरता के साथ प्रयास कर रही है और इसके लिए अनेक योजनाओं एवं कार्यक्रमों का संचालन भी कर रही है
जिसका थोड़ा-बहुत सकारात्मक परिणाम सामने आया है मगर मांग एवं आपूर्ति के बीच इतना लम्बा फासला है कि उसे पाटने में दिन और महीनों का नहीं बल्कि वर्षों का समय लग जाएगा।
सरकार ने 2030-31 तक देश में दलहनों का उत्पादन बढ़ाकर 350 लाख टन पर पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है जो 2024-25 सीजन के सकल उत्पादन 256 लाख टन से 94 लाख टन ज्यादा है।
इसका मतलब यह है कि अगले पांच साल में प्रत्येक वर्ष दलहनों के उत्पादन में 19 लाख टन का इजाफा करना पड़ेगा। मौसम एवं मानसून की स्थिति, बाजार भाव तथा आयात शुल्क आदि को देखते हुए यह लक्ष्य असंभव तो नहीं मगर अत्यन्त कठिन अवश्य प्रतीत होता है।
उद्योग बाजार क्षेत्र के विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारतीय किसानों को हर तरह का सहयोग-समर्थन एवं प्रोत्साहन मिले तो वह इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल हो सकता है।
उसमें क्षमता एवं मेहनत की कमी नहीं है लेकिन उत्साह का अभाव जरूर है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 सीजन के दौरान तिलहन फसलों का कुल घरेलू उत्पादन बढ़कर 430 लाख टन के करीब पहुंच गया जो किसानों के परिश्रम का ही सुखद परिणाम है।
विदेशों से सस्ते दलहनों एवं खाद्य तेलों का विशाल आयात होने तथा घरेलू बाजार भाव नरम रहने के बावजूद किसानों ने दलहन-तिलहन फसलों का उत्पादन बढ़ाने का हर संभव प्रयास किया।
सरकार को दलहानों एवं खाद्य तेलों पर आयात शुल्क का निर्धारण करते समय उपभोक्ताओं एवं उत्पादकों के हितों का ध्यान रखना चाहिए।
