रूई पर आयात शुल्क समाप्त करने के मुद्दे पर मतभेद

30-Apr-2026 05:01 PM

नई दिल्ली। यद्यपि पश्चिम एशिया में जारी संकट ऊंचे वैश्विक बाजार भाव तथा शिपिंग खर्च में हो रही बढ़ोत्तरी को देखते हुए केन्द्र सरकार रूई पर लागू आयात शुल्क को कम या खत्म करने का प्लान बना रही है और इसके लिए मिलर्स तथा वस्त्र उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत भी कर रही है लेकिन व्यापारियों का एक वर्ग सरकार के इस प्लान से सहमत नहीं है। उनका कहना है कि इस समय रूई पर आयात शुल्क को समाप्त करना सही नहीं होगा क्योंकि इससे घरेलू प्रभाग में कीमतों पर दबाव बढ़ेगा और उत्पादकों को आर्थिक नुकसान होगा।

खरीफ सीजन में कपास की बिजाई जून से जोर पकड़ती है जो अब ज्यादा दूर नहीं है। उससे पहले अगर रूई पर आयात शुल्क शून्य हो गया तो किसानों को कपास का क्षेत्रफल बढ़ाने का प्रोत्साहन नहीं मिलेगा।

उत्पादकों के पास लगभग 40 लाख गांठ (170 किलो की प्रत्येक गांठ) कपास का विशाल स्टॉक मौजूद है जो उसने आगे दाम बढ़ने एवं बेहतर कमाई  प्राप्त होने की उम्मीद से रोक रखा है। यदि शुल्क मुक्त आयात से रूई का घरेलू बाजार भाव घटता है तो किसानों को काफी नीचे दाम पर अपना उत्पाद बेचने के लिए विवश होना पड़ सकता है। 

पिछली बार जब रूई के आयात शुल्क में कटौती की गई थी तब किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे दाम पर अपना उत्पाद बेचने के लिए बाध्य होना पड़ा था। उस समय भी किसानों के पास लगभग 30 लाख गांठ कपास का स्टॉक उपलब्ध था।

अभी सरकारी एजेंसी- भारतीय कपास निगम (एफसीआई) के पास भी रूई का विशाल स्टॉक उपलब्ध है जिसकी बिक्री का तेज प्रयास किया जा रहा है। आगामी अक्टूबर माह से कपास की नई फसल की तुड़ाई-तैयारी जोर पकड़ने लगेगी जबकि पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान में इसकी आवक सितम्बर में ही शुरू हो जाती है।