खाद्य तेलों के विशाल आयात पर अंकुश लगाना आवश्यक
28-Nov-2025 08:59 PM
मुम्बई। भारत लम्बे समय से दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक देश बना हुआ है और यहां इसका वार्षिक आयात उछलकर 160 लाख टन के करीब पहुंच चुका है। इस विशाल आयात पर अरबों डॉलर खर्च हो रहा है जिससे राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था या विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है।
हालांकि सरकार तिलहनों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने का निरन्तर प्रयास कर रही है लेकिन खाद्य तेलों के आयात में भारी गिरावट आने का कोई संकेत नहीं मिल रहा है।
2022-23 में इसका आयात उछलकर 166 लाख टन के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था जो 2023-24 के मार्केटिंग सीजन में घटकर 159 लाख टन के करीब आया मगर 2024-25 के मार्केटिंग सीजन (नवम्बर-अक्टूबर) में पुनः बढ़कर 160 लाख टन से ऊपर पहुंच गया।
2024-25 के सीजन में पाम तेल के आयात में भारी गिरावट आई तो सोयाबीन तेल का आयात उछलकर शीर्ष स्तर पर पहुंच गया।
स्वदेशी तिलहन-तेल उद्योग के लिए यह स्थिति चिंताजनक मानी जा सकती है। सस्ते विदेशी खाद्य तेलों के विशाल आयत का सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है और उसे अपने तिलहनों का लाभप्रद मूल्य हासिल करने केलिय कठिन संघर्ष करना पड़ता है।
स्वयं केन्द्रीय कृषि मंत्री इस स्थिति से संतुष्ट नहीं है। उनका कहना है कि आयात शुल्क का निर्धारण करते समय आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ तिलहन उत्पादकों को हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
सोयाबीन एवं मूंगफली का घरेलू बाजार भाव घटकर काफी नीचे आने के कारण सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर इसकी भारी खरीद के लिए बाजार में हस्तक्षेप करण पड़ा।
विश्लेषकों का कहना है कि ऐसी स्थिति का निर्माण होना चाहिए जिसमें स्वदेशी तेल उद्योग को किसानों से एमएसपी पर तिलहनों की पूरी खरीद करने में कोई हिचकिचाहट न हो।
