गेहूं का अतिरिक्त निर्यात कोटा भी बाजार की धारणा बदलने में नाकाम

22-Apr-2026 06:52 PM

नई दिल्ली। हालांकि केन्द्र सरकार ने गेहूं का निर्यात कोटा 25 लाख टन से दोगुना बढ़ाकर 50 लाख टन निर्धारित कर दिया है लेकिन घरेलू बाजार में इसकी मिश्रित प्रतिक्रिया देखी जा रही है। अधिकांश व्यापार विश्लेषक इस अतिरिक्त निर्यात कोटे की प्रासंगिकता पर सवाल उठा रहे हैं।

उनका कहना है कि प्रथम चरण के दौरान जिस 25 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दी गई उसका अनुबंध करना मुश्किल हो रहा है क्योंकि वैश्विक बाजार भाव नीचे होने से भारतीय गेहूं की प्रतिस्पर्धी क्षमता समाप्त हो गई है और निर्यातकों को 'पड़ता' (पैरिटी) नहीं बैठ रहा है। जब उस कोटे का ही उपयोग नहीं हो रहा है तब इस अतिरिक्त कोटे की घोषणा की क्या जरूरत थी ?

वैसे कुछ समीक्षक इस अतिरिक्त निर्यात कोटे के निर्णय का समर्थन भी कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि भू-राजनैतिक हालत एवं जलवायु की स्थिति प्रतिकूल रही तो वैश्विक निर्यात बाजार में भारतीय गेहूं की प्रतिस्पर्धी क्षमता में सुधार आ सकता है और तब यह अतिरिक्त निर्यात कोटा लाभदायक साबित हो सकता है। 

ध्यान देने की बात है कि चालू वर्ष के दौरान न केवल मौसम की हालत कुछ हद तक प्रतिकूल रही बल्कि केन्द्रीय पूल के लिए गेहूं खरीद की रफ्तार भी धीमी बनी हुई है।

ऐसे परिदृश्य में गेहूं का निर्यात कोटा एकाएक दोगुना बढ़ाने का निर्णय कुछ अजीब लगता है। यह सही है कि केन्द्रीय बफर स्टॉक में गेहूं की पर्याप्त मात्रा मौजूद है जिससे यह घरेलू बाजार में आपूर्ति एवं उपलब्धता में आने वाली गिरावट की भरपाई करने के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है। 

1 अप्रैल 2026 को केन्द्रीय पूल में करीब 218 लाख टन गेहूं का स्टॉक मौजूद था जो 1 अप्रैल 2025 को उपलब्ध स्टॉक से 85 प्रतिशत ज्यादा था।

अप्रैल-जून के लिए बफर स्टॉक में कम से कम 75 लाख टन गेहूं का भंडार अवश्य होना चाहिए जबकि इस बार का स्टॉक उस नियत स्तर के दोगुने से भी काफी अधिक था।