बजट आवंटन में एक बार फिर कृषि क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता मिलने की उम्मीद
22-Jan-2025 05:55 PM
नई दिल्ली । तमाम औद्योगिक विकास के बावजूद भारत एक कृषि प्रधान देश बना हुआ है। देश की 42.3 प्रतिशत आबादी कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर है जबकि यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 18.2 प्रतिशत का योगदान देता है। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास की वृद्धि से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है।
केन्द्रीय आम बजट में कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र (पशु पालन, मत्स्य पालन एवं वानिकी आदि) के लिए राशि के आवंटन में निरंतर भारी बढ़ोत्तरी होती रही है।
वित्त वर्ष 2023-24 में इस क्षेत्र के लिए 27662.67 करोड़ रुपए का आवंटन हुआ था जो 2024-25 वित्त वर्ष के लिए बढ़कर 32,469.86 करोड़ रुपए हो गया।
जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, उपज दर में उतार-चढ़ाव तथा आधुनिकीकरण जैसी चुनौतियों से जूझ रहे भारतीय कृषि क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी तौर पर हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। इस प्रयास में कुछ हद तक सफलता भी हासिल हुई है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का प्रदर्शन अभी तक उत्साहवर्धक नहीं रहा है और वित्त वर्ष 2025-26 के केन्द्रीय आम बजट में इस पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है।
इसके साथ-साथ कृषि क्षेत्र के लिए ऋण की राशि बढ़ाई जा सकती है, किसान क्रेडिट कार्ड का विस्तार हो सकता है और पीएम किसान के लाभार्थियों को नियमित अनुदान प्राप्त होता रहेगा।
केन्द्र सरकार मुख्य कृषि फसलों- खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, गन्ना, कपास, जूट एवं बागानी फसलों- नारियल, सुपारी, रबड़, चाय, कॉफी एवं मसाले आदि के साथ-साथ पशु पालन, डेयरी विकास एवं मत्स्य पालन तथा ग्रामीण क्षेत्र की बुनियादी ढांचागत सुविधाओं के विकास-विस्तार के मद में विशाल धनराशि का आवंटन करती है।
न्यूतनम समर्थन मूल्य पर किसानों से प्रत्येक वर्ष भारी मात्रा में धान और गेहूं अनिवार्य रूप से खरीदा जाता है। इसके अलावा आवश्यकतानुसार दलहन, तिलहन, कपास तथा कोपरा आदि की खरीद भी की जाती है।
कृषि अर्थशास्त्री के मुताबिक आगामी केन्द्रीय आम बजट में समूहिक रूप से उत्पादकों के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाने की घोषणा हो सकती है, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश पर जोर दिया जा सकता है और बाजार सम्पर्क (पहुंच) में प्राइवेट क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने का प्रयास किया जा सकता है।
