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10-Oct-2026 02:50 PM
खरीफ फसलों की बिजाई समाप्त हो चुकी है और इसका कुल रकबा गत वर्ष से कुछ पीछे रह गया इसके तहत खासकर धान के उत्पादन क्षेत्र में करीब 4 प्रतिशत की गिरावट आ गई। अलनीनो मौसम चक्र का न केवल प्रभाव बरकरार है बल्कि आगामी समय में इसकी तीव्रता एवं ताकत बढ़ने की आशंका भी है।
इससे रबी कालीन फसलों की बिजाई पर असर पड़ सकता है। देश के प्रमुख बांधो जलाशयों में उसकी कुल भंडारण क्षमता के सापेक्ष महज 71 प्रतिशत पानी का स्टॉक बचा हुआ है जबकि सामान्य स्थिति में यह 85-90 प्रतिशत के करीब रहता है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा दीर्घकालीन औसत से 13 प्रतिशत कम हुई और अब उत्तर-पूर्व मानसून की बारिश का प्रदर्शन भी कमजोर रहने की संभावना व्यक्त की जा रही है। दक्षिण भारत में स्थिति ज्यादा गंभीर रह सकती है मालूम हो कि उत्तर-पूर्व मानसून से सर्वाधिक वर्षा दक्षिण भारत में होती है मगर अल नीनो के प्रकोप से यदि वहां बारिश में रुकावट आई तो रबी फसलों को क्षति की आशंका बढ़ सकती है। वहां पहले ही दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा में भारी कमी आ चुकी है।
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक राज्य भयंकर सूखे की चपेट में फंसे हुए है। वहां खरीफ फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। आस-पास के राज्यों में भी फसलों की हालत उत्साहवर्धक नहीं बताई जा रही है।
इसके फलस्वरूप राष्ट्रीय स्तर पर यदि खासकर दलहन एवं तिलहन फसलों का वास्तविक उत्पादन सरकारी लक्ष्य से काफी पीछे रह जाए तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी। प्रतिकूल मौसम से इस बार कृषि क्षेत्र तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने की संभावना है।
इसका असर कुछ उद्योगो और एफएलपीजी कम्पनियो के कारोबार पर पड़ना निश्चित माना जा रहा है। दूसरी ओर खाद्य महंगाई में इजाफा होने का खतरा भी मंडरा रहा है। विदेशो में दलहनों एवं खाद्य तेलों का भाव तेज होता जा रहा है। गन्ना की कमजोर फसल से चीनी उत्पादन में कमी आने की आशंका है।