कपास की उत्पादकता एवं पैदावार बढ़ाने हेतु पंचवर्षीय मिशन की घोषणा

03-Feb-2025 03:47 PM

नई दिल्ली  । कपास उत्पादकों के घटते उत्साह एवं आकर्षण को दोबारा बढ़ाने के इरादे से केन्द्रीय वित्त मंत्री ने देश में रूई की उत्पादकता एवं पैदावार में वृद्धि करने, क्वालिटी में सुधार लाने तथा इसकी निरंतरता को बहाल करने के लिए एक पंचवर्षीय राष्ट्रीय मिशन की घोषणा की है जिसमें अतिरिक्त लम्बाई वाले रेशे (ईएलएस) की कपास का उत्पादन बढ़ाने पर विशेष जोर दिया जाएगा। 

वित्त वर्ष 2025-26 के लिए लोकसभा में 1 फरवरी को केन्द्रीय आम बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि इस मिशन के माध्यम से कपास की खेती के तहत उत्पादकता एवं निरंतरता में भारी सुधार लाने में सहायता मिलेगी और उच्च क्वालिटी के ईएलएस उत्पाद की पैदावार बढ़ेगी। 

भारतीय कपास क्षेत्र अनेक कठिन चुनौतियों से जूझ रहा है और कपास के बिजाई क्षेत्र तथा रूई की उत्पादकता में गिरावट आ रही है।

कपास की फसल लाखों किसानों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प मानी जाती थी लेकिन कुछ चनौतियों एवं समस्याओं के कारण इसकी खेती में अब किसानों की दिलचस्पी घटती जा रही है।

एक महत्वपूर्ण कठिनाई यह है कि एक तरफ कपास उत्पादन का लागत खर्च बढ़ता जा रहा है तो दूसरी ओर इस पर होने वाली वापसी अनिश्चित हो गई है।

कभी भाव ऊंचा रहने से किसानों को अच्छी आमदनी प्राप्त हो जाती है तो कभी कीमतों में भारी गिरावट आने से उसे काफी नुकसान भी होता है।

भारत में कपास (रूई) की औसत उपज दर वैश्विक औसत से काफी नीचे रहती है जिससे किसानों को उचित उत्पादन नहीं मिल पाता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि कपास एक प्रमुख व्यावसायिक या औद्योगिक फसल है और भारत इसके शीर्ष उत्पादक देशों में शमिल है। रूई के कुल वैश्विक वार्षिक उत्पादन में भारत का योगदान 23 प्रतिशत के आसपास रहता है।

देश के लगभग 60 लाख कपास उत्पादकों की आजीविका का यह प्रमुख स्रोत है जबकि 4-5 करोड़ अन्य लोग भी कपास क्षेत्र की विभिन्न गतिविधियों से रोजगार तथा इनकम प्राप्त कर रहे हैं।

लेकिन यह क्षेत्र श्रमिकों तथा उच्च उपज दर वाले बीजों का भारी अभाव का सामना कर रहा है। इसके अलावा कपास की फसल को प्रति वर्ष प्रतिकूल मौसम, प्राकृतिक आपदाओं एवं कीड़ों-रोगों के प्रकोप का सामना भी करना पड़ता है।